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मित्र-वियोग - अनहद की कलम से

मित्र-वियोग

अमवा के वृक्ष पर अमिया जब आ गईं,
रमवा के बाग में हरियाली छा गई;
देख-देख अमिया प्रसन्न होए जाता था,
रमवा खुशी से घर, सर पर उठाता था।
दिन-दिन तो घंटा में बीते चले गए,
कुछ अमवा निचोड़े कुछ रीते चले गए।
देख देख सावन का महिना भी आ गया,
अमवा चले गये रमवा रुला गया।
सूज-सूज अँखियाँ रमवा की याद कर,
सोए नहीं दिन में और जागे वो रात भर…!

आप सभी को मैत्री दिवस की ढेरों शुभकामनाएं…!
वक्त और दूरी दोस्तों में तन के फ़ासले तो ला सकती है, मगर दिलों से दूर नहीं कर सकती।
आज 3 और 4 दशकों से दूर रह कर भी मेरे कई मित्र हैं जो मुझसे दूर रह कर भी कभी अलग नहीं हुए।
ज़रूर बिछड़ने के पल दर्द था छूट जाने का, भय था कभी ना मिल पाने का मगर दिलों के तार इस कदर जुड़े थे कि वक्त और दूरी उन्हें तोड़ ना सके..!
ऐसे ही कुछ मित्र जिनसे बिछड़ते वक्त के दर्द और ना मिल पाने के डर ने कुछ शब्द दिल के भीतर पिघला दिए थे आज मैत्री दिवस के मधुर अवसर पर आप सब के साथ बाँट रहा हूँ..!
आपकी याद में भी हों ऐसे कुछ पल तो हमसे साझा कीजियेगा।

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