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एक अजन्मे को पत्र
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विवाह- मिलन दो आत्माओं का - अनहद की कलम से

विवाह- मिलन दो आत्माओं का

है मिलन नहीं दूजा ऐसा, 
दो स्वयं मिले स्व मिला लिए;
बन्धन आत्माओं का स्वतन्त्र,
अनजान अभी, अब जान लिए।

जो परम आत्म को तुम चाहो,
बन्धन ये तुम्हें दिखा भी दे;
जो प्रेम पराकाष्ठा पहुँचे,
तुमको तुमसे ही मिलवा दे।

तुम तो फिर भाग्य बड़े रखते,
जिसको चाहा तुम पा ही लिए;
जो चाहा और उसे चाहो,
इतना कि प्रेम बस जिए-जिए।

दो पल का साथ नहीं ये तो,
जीवनभर साथ निभाना है;
रम जाएँ हृदय में दूजे के
इस तरह निकट निज आना है।

कुछ त्रुटि दिखे दूजे में जो,
स्व समझ स्वयं समझा ही दिए;
जो सुखद दिखे निज साथी में,
बस प्रेम दिए, सम्मान दिए।

काँटो का धाम नहीं, इसमें,
स्नेह पुष्प फैलाना है;
ये पुष्प नहीं मुरझाने को,
इनको बस खिलते जाना है।

कुछ भाव तनिक खोने होते,
अतिक्रोध, अहम् न ही स्वार्थ जिए;
विश्वास देवता संग रहे,
फिरता शंका शैतान लिए।

बिन व्यर्थ किए निज दीपों को,
दूजे के दीप जलाना है;
इस ज्योतिपुंज के जगमग में,
उज्ज्वल संसार बनाना है।

बस यही कामना करता हूँ,
बस यही भेंट मेरी तुमको;
इतना स्नेह बढ़ा जाओ,
ना क्षितिज दिखे मुझको तुमको।

९११२१८/९११२१८