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दीपक - अनहद की कलम से

दीपक

होम कर अपना अस्तित्व
तुम दे जाते हो
रात के गहन अंधकार में उजियारे की रोशनी …!
मौन… निस्वार्थ…!

दीपक तुम कितने प्रभावशाली हो,
हो नन्हे पर कितने बलशाली हो;
मैं अचरज करता तुमको जब देखूँ, 
कैसे तुम इतने आशावादी हो!

अंधकार से हम मानव डर जाते, 
लौ बनकर तुम उसको हर ले जाते;
सूरज के विश्राम समय में आकर, 
दीपक तुम, हम सबकी ज्योति बन जाते।

तुम जगते जब हम बेसुध हो सोते,
निशि से करते बात प्रहरी तुम होते;
अंधकार को चीर, खोद कर नभ को,
नई भोर के बीज तुम्ही हो बोते।

संघर्षो की सीख हमें तुम देते, 
हार-जीत से परे, शान से जीते;
निकट मृत्यु आ जाए तुम्हारे फिर भी, 
प्रहारान्त कर उसे शान्ति से वरते।

देख तुम्हें मेरा ये मन पुलकित है,
लिखता हूँ जो भी मन में संचित है;
नमन दीप करता मैं तुमको झुककर, 
शब्दकोष में शब्द बड़े सीमित हैं।

९००८१७/९१०३२१