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मन सोच रहा कुछ... - अनहद की कलम से

मन सोच रहा कुछ…

जीना तो होता है ‘आज’और अभी के
इस नित्य बहते पल में …!
मगर इस ‘आज’ को तो
बोया था ‘बीते हुए किसी कल’ में …!
और जो ‘आने वाला कल’ है
उसे हम बो रहे हैं ‘आज’ और अभी
की ज़मीन में …!

मन सोच रहा क्या?- ना जानूँ,
कुछ सोच रहा पर, है निश्चित।

कुछ स्मृतियाँ, कुछ वर्तमान,
कुछ कल्पनाएँ हैं आगे की;
जो गड्डमड्ड सब एक जगह,
कोशिश में हूँ सुलझाने की।

क्या किया अभी तक जीवन में, 
ये ही स्मृतियाँ सब सारी;
अनुभव ये ही सब रहे, मना की 
जमा रहे क्यारी-क्यारी।

कुछ असफलताओं के काँटे, 
कुछ सफल फूल की मुदित महक;
सब संग-साथ ही आ ठहरे, 
जीवन में भरने रुदन-चहक ।

सब सोच कभी रो पड़ता हूँ, 
तो कभी मन्द मुस्कान ज़रा;
कुछ याद क्रोध से भी भर दें,
कुछ में जीवन उत्साह भरा।

खोने-पाने की ये डालीं, 
हैं झूम रहीं मन में लहरा;
ना मिथ्या ये डालें झूमें, 
सब सबक, अर्थ रखती गहरा। 

मन सोच रहा, अब कुछ जानूँ,
कुछ सोचे आगे भी निश्चित।

है क्षणभंगुर यह वर्तमान, 
यह ही जीवन का परम सत्य;
मन सोचे क्या हूँ और कहाँ, 
क्या पाया है चाहा गन्तव्य?!

कितना कठोर, कितना मूदुल, 
कितना विशाल, कितना लघु;
सन्तुष्ट, कितना हूँ व्यथित, 
कितना अमूल्य या व्यर्थ हूँ!

ये वर्तमान के सभी चित्र, 
लो भूतकाल से रहे मिले;
कुछ जलते दीपक अभी बुझे, 
जो आस नहीं वो दीप जले।

ये फल वृक्षों पर लगे हुए, 
कुछ मीठे हैं, हैं कुछ कड़वे;
ये ही अब तक की पूँजी हैं, 
जो भूत-बीज से हैं पनपे।

मन सोच रहा क्या- अब जानूँ,
था, सोच रहा, क्या सब निश्चित?

कुछ सपने सुन्दर देख रहा, 
कुछ कल्पनाओं में खो जाऊँ;
पर क्या इन कल्पित बातों से, 
भावी जीवन को पा पाऊँ?!

ये कल्पनाएँ हैं मृगतृष्णा,
ये सपने मात्र छलावा है;
क्या कालगर्त में है रखा, 
मन समझे ‘एक भुलावा है’।

पर मन मेरा ये भी जाने, 
कितना महत्व सपने रखते;
हाँ, कल्पनाओं के आँगन में,
हम वर्तमान को बो सकते।

सुन्दर भावी की आकांक्षा, 
कुछ नई उमंगे भर देती;
ये कल्पनाएँ ही जीवन को, 
कुछ नई दिशाएँ दे देती।

मन सोच रहा ये तो जानूँ,
कुछ और, अलावा भी निश्चित...।

९२०३१४/९२०३१५