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बेबस, मौन विछोह-१ - अनहद की कलम से

बेबस, मौन विछोह-१

कितना मुश्किल साथ में चलना,
साथ छोड़ फिर चलना,
कितना मुश्किल रुक जाना है,
मोड़ साथ में मुड़ना…!
उम्र साथ, ना साथ हौसला,
ना विश्वास किसी का,
कितना मुश्किल मुड़के देखना,
मोड़ अजाने मुड़ना…!

बहुत आहिस्ता-आहिस्ता चल रहा था,
चल रहा था मैं, कुछ डरते-डरते,
कि चुपके से देख लेता था,
तुम साथ ही चल रही हो ना!

थम गया लेकिन मैं,
कि मैं; कि जिसने देखा था
तुम्हे अपने साथ- बिल्कुल साथ
चलते हुए,
कि जिसने देखा था, चुपके से,
तुम्हे अपनी ओर देखते हुए-
चुपके से,
अब देख रहा था,
तुम्हे मुड़ते हुए कोई ऐसा मोड़
कि जो मेरा नहीं था।

मैं थम गया....
वहीं, उसी चौराहे पर
कि मोड़ जिस पर तुम मुड़ गईं,
वो मेरा नहीं था,
और वो तुम्हारा भी नहीं था।

तुमने देखा था मुझे,
मैंने देख लिया था
कि तुमने देखा था मुझे,
कुछ उन नज़रों से
जो कहती थीं
कि तुम्हे रोक लूँ मैं,
नहीं मुड़ने दूँ वो मोड़,
जो मेरा नहीं था,
जो तुम्हारा भी नहीं था।

पर तुमने भी ती देख ली थीं
मेरी बेबस नज़रें,
जो बस तुम्हे देख सकती थी;
रोक नहीं सकतीं थी-
तुम्हे वो मोड़ मुड़ते,
जो मेरा नहीं था,
जो तुम्हारा भी नहीं था।

९२०११२/९२०११२