शांत, निस्पृह, मंद....
न कोई हलचल,
न ध्वनि कहीं से।
न आवेग कोई,
न उग्रता का तनिक अंश ही।
तूफान का कुछ
नाम तक दिखता नहीं...।
क्या जल ही सारा
तलहटी में चुक गया,
या जम गया
सम्पूर्ण सागर जम गया?
कितना प्रभावित हो दिखा था
वृहद सागर,
कल ही को जब
वृष्टि विध्वंसक हुई थी,
आज इतना शीघ्र
सब ही थम गया है।
वृष्टि अब भी है
पवन का वेग भी है,
चक्रवातों की भी
व्याकुल टोलियाँ हैं,
भँवर किन्तु जल में
कैसे थम गया है!
जानता हूँ मैं ही केवल
उस कठिन को,
मन पे मैंने किस तरह
काबू किया है।
नीर तो वायु से लड़ने
को है उत्सुक,
भँवर की परवा नहीं
कहता- 'हूँ प्रस्तुत’।
वायु से ही एक
समझौता हुआ है,
‘राह ना रोकेगा कोई’
-तय हुआ है।
वृष्टि का कुछ गर्व रखा
-छोड़ अपना,
कह दिया,
‘मजबूर मैं हूँ रौंद अब ना’।
कुछ समय ही
विषम होता जा रहा है,
पवन का कुछ
वेग बढ़ता जा रहा है।
जल को मैंने प्यार से
बहला रखा है,
पवन को अपना उसे
बतला रखा है।
पर भला कब तक
स्वयं को मैं छलूँगा!
पर भला कब तक
नियंत्रण रख सकूँगा!
सोच कर उस क्षण को
जब काबू ना होगा,
मैं सिहर उठता हूँ
अंदर तक बदन के।
आत्मघाती तो रहेगा
वो समय और,
वायु को भी मैं
हताहत कर रहूँगा।
कर सकूँ निर्माण ना,
मैं नाश का अधिकारी नहीं,
जानता ये तथ्य हूँ,
इस तथ्य से अज्ञानी नहीं;
इसलिए ही समय से
थोड़ा समर्थन चाहता हूँ,
शांत हूँ मैं, शांत हूँ और
शांति ही बस चाहता हूँ।
९२०६०१/९२०६१०





