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रविरस - अनहद की कलम से

रविरस

अल सुबह से प्रेम तुमसे हो गया था, 
शाम को उस ओर जाकर छिप गए तुम;
रात को प्रतिबिंब अपना भेजकर,
निश्चिंत कितने थे- दिखा अगली सुबह को!

राह तेरी कुछ दिनो में समझ आई,
पहर तो तेरे ही होने से हुए हैं,
ये पहर ही आँख, मेरे आँसुओं का,
रंग बदलें, चित्र बदलें- ये पहर ही।

इस तरफ से झाँक कर तुमने पुकारा,
आँख चमकी और आँसू छटपटाए,
बाँध कर तेरी छवि से नेत्र अपनी,
पुतलियों से मुस्कुराए-मुस्कुराए!

कर चढ़ाई शीश पर मेरे बिखेरीं,
रश्मियाँ अपनी सुनहरी- बेधड़क-सी,
मूँद कर आँखें, कभी आधे नयन से,
पी गया रविरस, अहा! क्या स्वाद आए!

"रुको सूरज! आज फिर वैसा ही पथ है।"
चीखते भय से, तनिक आशा-सी लेकर,
रोज़ तुमको यूँ फिसलता देखकर के,
नयन चिंतित और आँसू आ गए अब!

क्षितिज तुम ठहरे, नयन के रंग बोझिल,
डबडबाते नेत्र पलकों को झुकाए,
उस तरफ उतरे तो आँसू भी उतरकर,
गाल पर ढुलके, अंधेरा हो गया फिर!

अल सुबह से प्रेम तुमसे हो गया था,
शाम को उस ओर जाकर छिप गए तुम;
रात को प्रतिबिंब अपना भेजकर,
निश्चिंत कितने थे- दिखा अगली सुबह को!

९२०७२२/९२०७२२