संवेदना को हे कवि! तुम
क्षुद्रतम-सा जान बैठे,
वेदना की टीस का
उपचार हेतु मान बैठे।
तू दुखी जब-जब हुआ,
धड़क मेरी भी पिराई,
अनुभव किया,
संवेदना दिखलाई-
कभी ना ही दिखाई,
रीत भर तुम मान बैठे,
उचित है तब बोझ भारी!
व्यक्त हो, संवेदना लेकर हमारी!!
आत्मा के अनुभवों को,
देह में तुम ढूँढ़ते हो,
संवेदना, आवश्यक नहीं, उच्छवास हो,
तुम भूलते हो।
आत्मा ही सत्य है और
देह, शब्दों की पिटारी,
अनुभवो- संवेदना लेकर हमारी!
दुःख अपना दे सको सम्पूर्ण ना,
लो बाँट हम से,
शब्द मेंरे हृदय में तुम ले सको,
बच जाओ भ्रम से,
क्यों हमारे बीच ना हो,
सहृदय संवाद जारी।
सजग हो- संवेदना लेकर हमारी!
प्रकृति से फल लिए
जब तक डगर पर चल रहा हूँ,
हाय! कैसे मान लूँ,
निरपेक्ष, अकेला पल रहा हूँ?
संवेदना को मानते तुम,
मात्र झूठा इक दिखावा,
हर्ष का साधन कहा,
संवेदना को- बस छलावा !
हृदय पर अन्याय
और अपमान भारी!
चाहता संवेदना मैं अब तुम्हारी!
९२०९०१/९२०९०२





