“प्रेम,
तुम्हारे द्वार ये कोपलें
कैसे खिली हैं?
क्या सुवासित पुष्पों के इस
भ्रूण-रूप को
द्वार कोई और नहीं दीख पड़ता?!"
"ये अन्तर की कोपलें है-
ए राहगीर,
दिव्य इनकी महक और
ईश इनका स्वरूप है।
कोमलता ही इनका जल
और तड़प ही इनकी ऊष्मा है।
मेरे अतिरिक्त कहाँ प्राप्य है,
ये जल और ये तड़प ?!
कहो तो....!!”
०९०२२७/०९०२२७





