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एक अजन्मे को पत्र
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हर वक़्त मैं जवाँ हूँ - अनहद की कलम से

हर वक़्त मैं जवाँ हूँ

था रंग जवानी का औ' 
रोशन थी ज़िंदगी,
हासिल थी हरिक शै,
ना गुलामी ना बंदगी।
हर यार कह रहा था,
मुकद्दर कमाल है,
परवाज़ है फ़लक पे औ'
हासिल है बुलंदी।

हर वक़्त मैं जवाँ हूँ,
हर वक़्त मैं जवाँ!

है वो ही शान-ऐ-शौकत,
वैसा ही जिस्म हासिल,
यारों की थी मोहब्बत,
खुशफमियों में ग़ाफ़िल।
धोखा नहीं जो देते,
ये सच्चे आईने हैं,
दुश्वारियाँ जो दिखतीं,
आँखों में होके दाखिल।

मगर फिर भी-
हर वक़्त मैं जवाँ हूँ,
हर वक़्त मैं जवाँ!

ये वक़्त का गुज़रना
पलकों के झपकते ही,
लम्हा कहाँ मिलेगा
लम्हे के निकलते ही।
पर दिल की धड़कनों में
ये गीत लिख रहा हूँ-
हर नज़्म मैं जवाँ हूँ,
हर बज़्म मैं जवाँ!

ये ज़ुल्फ मेरे सर पे,
कमतर सी हो चली है,
माथे की ये लकीरें
कुछ सख़्त हो चली है।
दिखती है उम्र मेरी,
बेगार हो रहा हूँ,
मोहताज़ दूसरों पर
तारीख़ हो चली है।

मगर फिर भी-
हर वक़्त मैं जवाँ हूँ,
हर वक़्त मैं जवाँ!

ये उम्र जवानी,
नहीं ढलता हुआ बदन है,
आधा हुआ फ़साना,
आधा ही अब चमन है।
जो फ़ासले हो लंबे,
पाँवों की हो मुसीबत,
नामों-शकल किसी के
रहते नहीं ज़ेहन में।

मगर फिर भी-
हर वक़्त मैं जवाँ हूँ,
हर वक़्त मैं जवाँ!

ये वक़्त का गुज़रना
पलकों के झपकते ही,
लम्हा कहाँ मिलेगा
लम्हे के निकलते ही।
हर उम्र के तज़ुर्बे
कदमों से लिख रहा हूँ,
हर राह मैं जवाँ हूँ,
मंज़िल पे मैं जवाँ!

करता हूँ शुक्रिया अब,
दिल की ज़ुबां से यारों,
मिलती दुआएँ आपकी
रौनक बहारें यारों।
महफिल में तुम जो आए,
मेरी दुआएँ तुमको,
मिसरा मेरी ग़ज़ल का
तुम पर निसार यारों-
'हर वक़्त तुम जवाँ हो,
हर वक़्त तुम जवाँ!'

ये वक़्त का गुज़रना
पलकों के झपकते ही,
लम्हा कहाँ मिलेगा
लम्हे के निकलते ही।
है इल्तिज़ा ये मेरी,
ख्वाहिश ये कर रहा हूँ,
'हर वक़्त तुम जवाँ हो,
हर वक़्त मैं जवाँ!!'

२५०१२१/२५०१२२