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क्या फिर भी दूर हैं हम! - अनहद की कलम से

क्या फिर भी दूर हैं हम!

शैली- १

वो सितारे, जो तुम देखती हो,
नज़र में हैं मेरे भी वही।

वो चाँद जिसे ढूँढ़ती है
तुम्हारी निगाहें,
खोजता हूँ मैं भी
उसे काली रात में।

ये हवा जो गुज़री है
मुझे छूकर अभी,
आई थी चूमकर
बदन तेरा भी।

वो ख़याल कि जिसमें
गुम है दिल तेरा,
मुझे भी घेरे हैं बस वही।

और तुम कहती हो कि
फ़ासले लंबे हैं दरमियाँ....

शैली-

आसमान में तारे संग-संग,
देख रहीं तुम, देख रहा मैं!

दूज का नन्हा-प्यारा चंदा,
देख रहीं तुम, देख रहा मैं!

हवा अभी जो छूकर तुमको
निकली, मुझको चूम रही है।

वही विचारों का सागर है,
घिरी हुईं तुम, घिरा हुआ मैं।

... तुम कहतीं हम दूर बहुत हैं!!

०६०४०२/०६०४०२