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सृजन - अनहद की कलम से

सृजन

'सृजन' तुम जन्मने के पहले ही 
जन्म ले लेते हो।

तुम्हारे साक्षात अस्तित्व में
आने के पहले-
सृजन की पीड़ा तो
कभी पहले ही शुरू हो चुकी होती है!

तुम्हारे साक्षात होने का
संभावित सुख भी
शायद उस पीड़ा- उस मीठी
और आवश्यक पीड़ा में छिपा है।

गर्भ में तुम्हारे उपजते ही,
सृजक- क्या नहीं व्यग्र हो उठता
इस सृजन को व्यक्त करने को?

गर्भ में तुम्हारे उपजते ही,
सृजक- क्या नहीं भय उपजता उसमें,
इस सृजन के अव्यक्त रह जाने का?

गर्भ में तुम्हारे उपजते ही,
सृजक, अनुभव करता है
तुम्हारी अठखेलियाँ, तुम्हारी क्रीड़ाएँ-
पोषित करता है तुम्हें!

"व्यक्त होने का भी वक़्त होता है।"
वक़्त के पहले भी व्यक्त हो जाना,
अव्यक्त ही रह जाता है,
वक़्त के बाद भी!

खूब सृजन ऐसे ही व्यर्थ होते हैं,
खूब सृजक ऐसे ही व्यर्थ होते हैं!

०७१०२८/०७१०२८