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अपने रूप में रहो! - अनहद की कलम से

अपने रूप में रहो!

ज़िंदगी की दौड़ में,
मुकाबले औ' होड़ में,
दूसरे से जीतने को दौड़ता!
किंतु चक्र में सभी,
हैं दौड़ते अभी-अभी,
है कौन आगे, किसको पीछे छोड़ता?!

ज़िंदगी की दौड़ में,
देखो जोड़-तोड़ में,
दौड़ किससे जीतते या हारते?!
इक गुलाब खिल गया,
वो कमल निखर गया,
तो बोलो होड़ किससे है, ये जानते?!

बाग में महक रहा,
वो कीच में संवर रहा,
ये बीच कंटकों में मुस्कुरा रहा।
हरिक पुष्प शुद्ध है,
ना बीच कोई युद्ध है,
तो बाग सारा साथ खिलखिला रहा।

ये मनुष्य ही मगर,
भागता इधर-उधर,
दूसरों-से रूप-रंग के लिए।
शक्ल वो बदल रहा,
अक्ल वो बदल रहा,
दूसरों की चश्म से, नज़र लिए!

खिल रहो, महक रहो,
अपने रूप में रहो,
दूसरे के रंग ना उधार लो।
ये सबक सभी अगर,
सीख ले डगर-डगर,
सब धरा ये बाग के समान हो!

२५०४१४/२५०४१४