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रहो 'रियल' बस यही फ़र्ज़ है! - अनहद की कलम से

रहो ‘रियल’ बस यही फ़र्ज़ है!

शब्द अलग हैं, अर्थ 'सेम' है, 
गीत अलग दो, तर्ज़ एक है,
गाते हो कितना भी सुर में,
नकली है जो 'ट्यून' 'फेक' है!

चलती हैं वो साथ मगर
दो 'लाइंस' कभी ना मिलती हैं,
'रेल' की दो पटरी भी बिल्कुल,
दूर-दूर ही चलती हैं।'
ऐसे ही कुछ 'वर्ड्स' हमारे,
'डेली' 'यूज़' में आते हैं,
'लाइंस' 'पैरलल' उनकी
पर हम 'क्रॉस' उन्हें कर जाते हैं।

अर्थ एक जैसे लगते हैं,
'डीप' मायने उल्टे हैं,
गहरे मतलब एक 'वर्ड' के,
'अदर-वर्ड' के उथले हैं।
इन शब्दों के गलत 'यूज़' से,
निजता सारी मिट जाती,
पहन मुखौटा 'परसोना' की,
नकली सूरत चढ़ जाती।

अर्थ गलत ये सुनते-सुनते,
असली मतलब खो जाता;
नकली को ही असल समझ कर,
खुद ही मन भरमा जाता।

आप सोचते होंगे ऐसे
शब्द निराले कैसे हैं,
हमको तो कुछ ख्याल न आते,
इनको दिखते कैसे हैं?!
तो भैया हम तुम्हें बताते,
बहिना तुम भी सुन लेना,
बच्चों, मामा और ताऊजी,
दादा-दादी गुन लेना।

’गेम’, ’प्ले' दोनो का मतलब,
खेलकूद बतलाते हैं,
दोनो लगते एक सरीखे
अंतर हम समझाते हैं।
‘प्ले’ मतलब खेलें मस्ती में,
हार-जीत की 'वरी' नहीं,
‘गेम’ कहें तो 'गोल', 'प्लान' बस,
धींगा-मस्ती करी नहीं।

’नॉलेज' और ’नोइंग' दोनो ही
ज्ञान शब्द का अर्थ लिए,
अक्षर पहले चार एक पर,
'वर्ड्स' अलग संदर्भ लिए।
'नोइंग' तो है ज्ञान,
'सेल्फ' के अनुभव से उत्पन्न हुआ,
लेकिन ’नॉलेज' मात्र सूचना-संग्रह
जो 'स्टोर' हुआ।

बाबा समझे 'प्राइस' और 'वैल्यू',
दोनो ही कीमत है,
पर 'वैल्यू' तो आँक न पाए,
'प्राइस–टैग' तक सीमित है।
’वैल्यू’ तो रिश्ते–नातों की
आदर, प्यार, मोहब्बत की;
’प्राइस’ तो 'मैटर' की होती,
दोस्त, यार ना सोहबत की।

‘इंटेल’, ‘इंटेल’ 'सेम-सेम' है,
दोनों शब्दों में काका,
‘इंटेलेक्ट’, ‘इंटेलिजेंस’–
बुद्धि है 'मीनिंग' ओ’ बाबा!
‘इंटेलेक्ट’ बस उथली-उथली,
सोच-विचारों से आती,
मगर दोस्त ‘इंटेलिजेंस’ तो
भीतर से खिलती जाती।

’प्रोडक्शन' या कहें ‘क्रिएशन',
अर्थ बनाना होता है,
किंतु बनाने की 'प्रोसेस' में,
फ़र्क ओ' नाना होता है।
‘प्रोडक्शन’ सब एक तरह के,
'बल्क-आइटम्स' बन जाते;
किंतु ‘क्रिएशन’ नए-नए सब,
फूल बाग में खिल जाते।

और, ’लोनली' या ’अलोन' में,
अंतर कुछ बतला पाओ,
कहें अकेला दोनों को,
तुम भैया भेद बता पाओ।
जनता करती 'फील' ‘लोनली’,
'बोर' अकेले हो जाए,
संन्यासी रहता ‘अलोन’ पर
भीतर 'ब्लिस' को पा जाए।

ऐसे तो अल्फ़ाज़ बहुत है,
जिनके 'मीनिंग' 'सेम' लगें,
’थिंकिंग’ में कुछ भेद ना लगता,
‘बीइंग’ में 'डिफरेंट' लगें।
कभी ‘क्वांटिटी’ को दद्दा तुम,
मानो माप ‘क्वालिटी’ का,
'रिएक्शन', 'रिस्पांस'–सा लगता,
'सीरियस', 'सिन्सि-यरिटी' सा!

अब शायद तुम समझ गए,
ये शब्द निराले चाचाजी,
आगे से 'कन्फ्यूज़' ना होना,
बोलेगें जब 'पापा'जी।
जितना रहो 'अवेयर' बहिना,
निजता अपनी पहचानो,
‘परसोना’ का अर्थ मुखौटा,
ना पहनो- जो तुम जानो।

वही शब्द है, अर्थ नए हैं,
गीत वही पर नई तर्ज़ है,
गाओ इनको सही सुरों में,
रहो 'रियल' बस यही फ़र्ज़ है।

२५०७०७/२५०७२२