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प्रेम-स्पर्श - अनहद की कलम से

प्रेम-स्पर्श

अपनी पलकों को तनिक मिला लो-
सोचो कि इक पलक तुम
और इक मैं हूँ!
तब तुम्हारी नम होती
आँखो की तरलता,
हम दोनों के बीच बहता प्यार है...!

उसे बन जाने दो आँसू
और बहने दो अपने गाल पर,
मैं इन आँसुओं में ही बहता,
पुलकित हूँ तुम्हारा स्पर्श पाकर!

चुपके से चूम लेता हूँ,
तुम्हारे कोमल गालों को!
सच ही तो कह रहा था प्रिये,
तुम देखो-
मेरे हाथों में तुम्हारे गालों का स्पर्श
अब भी है;
मेरे होठों पर
तुम्हारी कोमलता का स्पंदन,
अब भी है!!

०९०२२८/०९०२२८