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…सिर्फ होने के लिए! - अनहद की कलम से

…सिर्फ होने के लिए!

देह में चुभते-चुभते,
तुम्हारी आँखो को भी चुभने लगे हैं।
काँटों का भी उद्देष्य होता है कोई...
या निपट निर-उद्देष्य भी हो सकते हैं...
...सिर्फ होने के लिए... !!

०९०३२४/०९०३२४