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मैं कहाँ और ये कहाँ - अनहद की कलम से

मैं कहाँ और ये कहाँ

प्रेम के गणित में उलझे हुए तुम, 
फायदे की बात ही करते रहे।
फूल प्लास्टिक के लगाए फिर रहे हो,
चीखते हो खुशबूएँ गुम हो गई हैं।

तुमने बस अक्सों में ही जीना है सीखा,
रोशनी की सलवटें बस दीखती हैें।
तुम हज़ारों जन्म लेकर भी यहाँ पर,
आज तक बस करवटें बदला किए हो।

तुम हवाओं से कभी बाते किए थे,
वो तुम्हारा घर बहुत पहचानती हैं।
तुमने दीवारे रंगी है शौक से पर,
ईंट को सौदे पे तुम बैठा चुके हो।

तुमने अश्कों को तरन्नुम में कभी भी,
नाचने का भ्रम भी ना पैदा किया है।
तुम खुदा को देख कर इठला रहे हो-
मैं कहाँ और ये कहाँ!

०९०४२४/०९०४२४