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एक अजन्मे को पत्र
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देह-प्रेम - अनहद की कलम से

देह-प्रेम

तुम भवन के साथ भँवरे हो जाते हो।
ईंट, गारा, रेत, मिट्टी से बना;
चमकदार और चटकदार
रंगों से लिपटा!
तुम अक्स देख कितने मोहित हो!
तनिक इधर से, तनिक उधर से-
तराशने में कितने मगन,
कि कोई खटखटाता है
भवन के मुख्य द्वार को-
कोई भान ही नहीं!

तुम मृत्यु की
भयपूर्ण प्रतीक्षा करते हो- मृत्यु!

०९०४२४/०९०४२४