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तीन प्रेम-विरह गीत - अनहद की कलम से

तीन प्रेम-विरह गीत

एक- ये चाँद

अपने गाँव भी यही चाँद ले जाना -
मैं याद रहूँगा!

कभी अमावस में भी
आसमाँ मे टाँक देना..!

मैंने तारों को मना लिया है
और झील को समझा दिया है.!!

११०५०९

दो- टीस तन्हाई की

एक टीस-सी रह-रह के 
इस दिल से निकलती है,
तू दूर सितारों में
छुप कर जो बैठी है।

मैं आज अकेला हूँ
दरबार-ए-सितारों में,
तन्हाई की ये महफिल
तकदीर में लिख दी है।

०४०६०९

तीन- विरह-अग्नि

इस झुलसती गर्मी में,
तुम दे सकती थीं,
शीतलता का अहसास!
पर तुम भी दूर चल पड़ीं।

मैं नहीं कहता तुम्हे ये समझने को,
क्योंकि ये तो है मेरे दिल के इक
नासमझ कोने का बालपन...!

१७०६०९