जीवन के दो मूलाधार,
वायु और जल से संसार।
वायु मनुज साँसों में लेता,
इन साँसों से जीवन बनता,
दो साँसों के मध्य श्रेयस में,
धन्यवाद वृक्षों का गुनता।
वृक्षों का परिवार वनों में,
सूरज की किरणों को पीकर,
धरती की गोदी में जीकर,
वायु-सृजन का चक्र बनाता।
मेंघों के भीषणतम रण में,
जब जल-वृष्टि सघन होती है,
वेग प्रचंड, जल चट्टानों से,
प्रलय ही बस सम्मुख होती है।
वन-वृक्षों के प्रेम को पाकर,
जल-प्रचंड भी थम जाता है,
सागर में जितना आवश्यक,
धरती में भी सम जाता है।
ये जल धरती में संचित हो,
हर जीवन की प्यास बुझाए,
इन वृक्षों के ना रहने पर,
कहो, कहाँ ये जल रह पाये!
वायु-तत्व के अनुपातों को,
वृक्ष सँजो के रखता है,
वायु-क्षेत्र के तापों को भी,
वृक्ष रेख में रखता है।
इन-वृक्षों के प्रेम-सूत्र पर,
हम सबको कोई भ्रम नहीं,
जान सकें ये सत्यरूप में,
वन नहीं तो हम नहीं!
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