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उम्मीद, नाउम्मीद और धन्यवाद - अनहद की कलम से

उम्मीद, नाउम्मीद और धन्यवाद

एक- उम्मीद

कुछ समझ नहीं आ रहा!
सच में बहुत
उम्मीद रहती है हर रोज़...
हर रोज़ पर यूँ ही गुज़र जाता है...
तेरे इन्तज़ार में बस यूँ चुप हूँ...
और इस चुप में ही जिया जाता हूँ!

दो- उम्मीद,नाउम्मीद

के दिल करता है कि सुबू उठूँ 
और तेरा नूर नज़र आए,
औ' के शब के सिर नवाने तक
बदस्तूर बढ़ता जाए।

पर फ़कत ही ये उम्मीदें
ना फलक पे झिलमिलाती,
ना कभी तो सुबू दिखती
ना ये रात नूर लाती!

तीन- धन्यवाद

किन्तु फिर भी हमें 
उस प्यार में और डूबना है-
उस प्यार में,
जो हमें मिला है तकदीर से।
ना जाने कितने असंख्य
इस धरती पर आए, गए...
और मौजूद हैं,
जो नहीं महसूस सकते
इस प्यार के अल्फाज़ को
नहीं ले सकते इस प्यार की गंध को,
और नहीं सुन सकते प्यार के इस संगीत को !
हमारा सौभाग्य...
हमारा धन्यवाद...!

क्या करें?

प्रार्थना...! प्रेम...! समर्पण...!
धैर्य...! विश्वास...!धन्यवाद...!

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