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कितना धीरज! - अनहद की कलम से

कितना धीरज!

कितना धीरज...!
बूँद-बूँद घट भर जाता है,
पर क्या धीरज रख पाता है?!

बीते बरस खेत बुआया,
बारिश की सहजी आस,
खेत दरारें, खेत हो गए,
ना आई बरसात।

रूठी खेती, रूठा भाग;
रोया मन, असुअन का साथ।

बहते-बहते सारा पानी उड़ जाता है,
पर क्या बादल बन पाता है...!

१७११०९/१७११०९