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दो प्रार्थनाएँ प्रभु से - अनहद की कलम से

दो प्रार्थनाएँ प्रभु से

एक- पिघला लो मुझे अपने आप में!

प्रभु! इस सत्य मे मुझे स्थित करो।
पिघला लो मुझे अपने आप में। 
क्यों, क्या हम दोनों का तत्व 
ऐसा नहीं है
जो घुल जाए एक-दूसरे में?!
पिघला दो प्रभु अपने साथ 
और बहने दो अनिश्चित दिशा में। 
करने दो आलिंगन 
जो भी मिलता है- बहाव में, 
कि कोई मुझसे अलग तो नहीं!

दो- तुम बनना वाणी मेरी!

तुम रहना प्रभु
साथ-
तुम रहना प्रभु ।
मैं जब कहता होऊँगा उन्हे
कुछ करने को,
तुम ही बनना वाणी मेरी।
और तुम मुझे लगातार
इस खयाल में रखना
कि ये वाणी तुम्हारी ही है।
बाद के अहंकार के टूटने का दर्द
मैं सह नहीं पाऊँगा, प्रभु!

१८०९०७/१८०९०८