इस ‘ॐ’ नाद के करने से,
पाषाण शिलाएँ टूट रहीं;
मन चट्टानों के ढहने से,
ओंकार ध्वनि ही गूंज रही।
अंतरतम के स्पंदन हैं,
ओंकार नाद की टकराहट;
कुछ पिघला, शीतल बहता है,
हिय में, परमेश्वर की आहट।
ओंकार नाम बस लेता जा,
कर मन अवरुद्ध विचारों से;
जपते-जपते ओंकार नाद,
बज उठे हृदय के तारों से।
ओंकार नाम से गूंज रहा, सर्वस्व
तू रीता बीत रहा;
तू दौड़-दौड़ खोता जाता,
ओंकार नाम बिन जीत कहाँ।
१८१००३/१८१००३





