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द्विविधा, शिकायत और दर्द के स्वर - अनहद की कलम से

द्विविधा, शिकायत और दर्द के स्वर

जहाँ में काम करना है, 
जहाँ में हो रहा सब खुद,
जहाँ होना है करता हूँ,
जहाँ करना है तकता हूँ।

जहाँ करने में हक मेरा,
वहाँ मैं चूक जाता हूँ,
जहाँ परिणाम का डेरा,
वहाँ चक्कर लगाता हूँ।

बड़ी दुविधा में हूँ गाफ़िल,
कहाँ करना, कहाँ तकना,
मेरी आदत है विधियों की,
विधि अदृष्य पाता हूँ।
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तुम दिखते नहीं परमात्मा,
किस ओर छिप बैठे,
कभी तो व्याकुलों की क्लांतता पर,
उफ् तो तुम कर दो।

तुम्हारा सर्वव्यापी वास,
कभी मुझको चिढ़ाता है,
मेरी तन्हाई में भी तुम,
ज़रा छिप कर बरसते हो।
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कभी विश्वास रखने की सलाह,
भीतर से मिलती है;
कभी धीरज की सीखें ध्यान में,
अंतर उतरती हैं।

ये है मुश्किलों का दौर,
कम होते नहीं दिखता,
कभी चीखें निकलती हैं,
कभी सिसकी पिघलती है।

१९१००१/१९१००१