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इंतज़ार - अनहद की कलम से

इंतज़ार

खुली खिड़‌की पर बैठकर 
न जाने कब से मैं करती हूँ इंतज़ार
कि वो आए
और मुझे ले जाए अपने साथ।
मगर वो नहीं आता!

पता नहीं मेरा संदेश
उस तक पहुँचता है या नहीं!
मैं तो कभी हवा से,
कभी किसी पंछी से,
कभी पेड़ों से
और कभी चाँद से ही कह देती हूँ-
कि सुना था
कि वो जानते हैं उसे बड़े करीब से!

कहीं यूँ तो नहीं
कि वो आता हो
और मुझे देख न पाता हो?!

मैं सरक कर ज़रा और
झरोखे की ओर खिसक आती हूँ...
और फिर करती हूँ इंतज़ार
कि वो आए
और ले जाए मुझे अपने साथ...।
मगर वो फिर भी नहीं आता।

मैं, कभी गाती हूँ कोई गीत,
लिखती हूँ कोई कविता,
कभी बना चित्र उसका
उसी चित्र से करती हूँ मनुहार...
पहरों,
कि कोई कहता है
कि ये पुकारें समझता है वो खूब!

कहीं यूँ तो नहीं
कि वो आता हो
और कर ना पाता हो महसूस मुझे?!
मैं बहा कर आँसू
कुछ और दिल की गहराई से गाती हूँ,
लिख ढेर से गीत,
और फिर करती हूँ इंतज़ार
कि वो आए और
ले जाए मुझे अपने साथ।
मगर वो फिर भी नहीं आता!

मैं करके बंद आँखे
जाती हूँ अपने भीतर... और भीतर
टटोलती हूँ उन अज्ञात अंधेरों में;
दूढ़तीं हूँ उन अनछुई गुफाओं में-
कि समझाते है वो कई,
कि ध्यान से नाता है, गहरा उसका।

कहीं यूँ तो नहीं
कि वो आता हो, और
पुकारता हो मुझे,
पर मैं ही नहीं देख पाती,
और बस यूँ ही
करती हूँ इंतज़ार
कि वो आए
और ले जाए मुझे अपने साथ!

१९१०१५/१९१०१६