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प्रेम सजाना पड़ता है - अनहद की कलम से

प्रेम सजाना पड़ता है

ये इतनी आसां बात नहीं, 
तुम नदी नहा कर मुक्त हुए;
ये इतना सरल नहीं रस्ता,
तुम मक्का जा आजाद हुए।

खुद को पिघलाना पड़ता है,
खुद को मिट जाना पड़‌ता है,
जल-जल कर पाक-पवित होकर,
मंदिर बन जाना पड़‌ता है।

तुम कहते व्रत-उपवास किए,
तुम कहते गुरु-अरदास किए,
कुछ रोज़े, पूजा और नमाज़ कर
कहते, प्रभु के दास हुए।

प्रभुदास नहीं यू हो जाते,
कुछ देर खुदा के सजदे कर,
रब की कुछ देर खुशामद से,
थोथे शब्दों से अपर्ण कर।

उसमें रम जाना पड़ता है,
उसको पी जाना पड़‌ता है,
यम बन भी वो दरवाजे पर,
आए तो जाना पड़‌ता है।

तुम अकड़े दान-दक्षिणा कर,
तुम अहंकार में, सेवा कर,
बुत पूज, तोड़ कर मांग रहे,
जन्नत हो जाए तुम्हे नज़र।

जन्नत ऐसे ना मिल जाती,
साधु का स्वाँग रचा कर के,
जामा फ़कीर का ओढ़ चले,
कपड़ों को रंग रंगा कर के।

सब कुछ खो जाना पड़ता है,
'ना-कुछ' हो जाना पड़ता है,
उसके मुख अधरों से बजती
मुरली हो जाना पड़ता है।

तुम आयत, शास्त्र रटा करते,
गीता, गुरुग्रंथ पढ़ा करते,
कोरे लफ़्ज़ों को सत्य मान
ज्ञानी और शेख बना करते।

ज्ञानी ऐसे ना बन जाते,
अक्षर उधार के दोहरा कर,
शेखी-खोरों से रह जाते,
पोंगा-पंडित पोथी पढ़कर।

अनुभव गहराना पड़ता है,
निर्ध्वनि में जाना पड़ता है,
शब्दों के पार गहन भीतर,
बस प्रेम सजाना पड़ता है।

जल-जल कर पाक-पवित हो कर,
मंदिर बन जाना पड़ता है।

१९१०१९/१९१०२०