वृक्ष समेटे हैं
बहुत से दैवीय संदेश।
बस करते हैं प्रतीक्षा,
किसी खोजी,
किसी सुनने वाले की।
मिलते ही बता देते हैं,
धरती पर गिरने के नियम;
साथ बहते ही खोल देते हैं,
धरती पर ऊपर उठने का रहस्य।
न्यूटन या बुद्ध-सी
बस तृष्णा चाहते हैं,
न्यूटन या बुद्ध-सा
बस समर्पण चाहते हैं।
वृक्ष समेटे हैं
बहुत से दैवीय संदेश।
वृक्ष भरे हैं संदेशों से,
सृजन-सृष्टि के सत्य लिए।
हम खुल जाएँ तनिक देर,
हमको संदेश सुना देते।
खुल कर मिलने पर बतला दें,
नियम धरा पर गिरने का,
खुल कर बहने पर वो खोलें,
राज़ धरा पर उठने का।
न्यूटन या फिर बुद्ध सरीखी,
तृष्णा की उम्मीद लिए,
वृक्ष भरे हैं संदेशों से,
सृजन-सृष्टि के सत्य लिए।
१९१०२३/१९१०२३





