सब कुछ जैसे जम-सा गया है।
जमावट तो भीड़ की है,
किंतु वो भगदड़ किसी एक जगह
जैसे रुकी-सी है।
कोई कोलाहल या शोरगुल नहीं है,
सब जैसे एक
कसी जमावट में थमा-सा।
ना भगदड़ ना कोई आपाधापी,
ना कोई मद्धिम-सी आवाज़ भी।
एक शांति...
जैसे किसी खास ध्वनि को ढूढ़ती हो।
स्थिर-सी आँखें
जैसे इस जमी-सी भीड़ में
संपूर्ण अस्तित्वहीनता को खोजती हों।
इस बर्फ-सी जमावट की
निपट व्यर्थता;
जो इसके थमने से पहले मचाती थी
अनर्गल शोर;
जैसे पिघल कर बह जाएगी,
जरा-सी ही किसी तपन से।
कोई है- जो कुछ ढूँढ़ता-सा
जान पड़ता है-
घूमता इस जमी हुई भीड़ में,
देखता उस भीड़ और
उसके रह गए खालीपन को।
वो ढूँढ़ता है,
या फिर कर रहा है उम्मीद,
अचानक सब बह जाने की,
या कि धीरे-धीरे ही
इस सब के गलते जाने की-
कि "कुछ नहीं" के कुछ आभास-से
उसको चलाते हैं-
फिसलाते, लुढ़काते-से,
और उन आभासों के
कोमल खिंचावों में
वो उनको ही सत्य में बदलते
देख पाने के विश्वास में खोया-सा-
निर्द्वन्द्व
करता है प्रतीक्षा
और घूमता है उसी जमी-सी भीड़ में
निर्लिप्त,
इसी व्यर्थता को पिघलते देखने,
और देखने उस पिघलने से
किसी सार्थक के
ना उपजने के खेल को।
१९११२१/१९११२१





