ऐसा लगता है कि जैसे,
बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है।
मन की परतें हैं सघन
और ठोस बिल्कुल,
उनसे ही रिस-रिस के अपनी
राह चलती-
कभी थमती, कभी बढ़ती,
कभी परतों पर सरकती, वो भटकती,
उस अजानी राह पर बढ़ जा रही है।
ऐसा लगता है कि जैसे,
बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है।
वो सघन परतें कभी उसको दबाती,
कभी कोमल हो के छल से,
वो बुलाकर,
और फुसलाकर दिशा उल्टी बताती।
बूँद भी पर कौन जाने,
किस जगत से शक्ति पाकर,
अनचली-सी राह पर बढ़ जा रही है।
ऐसा लगता है कि जैसे
बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है।
बूँद की ज़िद, और तृष्णा बूँद की।
मन की परतों की सघनता क्षीण होती।
रोशनी की चंद किरणें टिमटिमाती-
अभी दिखती, अभी ओझल-
फिर कभी परतों के लंबे शून्य में-
रोशनी ही रोशनी बस झिलमिलाती।
बूँद भी उस
रोशनी की झलकियों से जोश पाकर,
धुँधली-उजली राह पर, बढ़ जा रही है।
ऐसा लगता है कि जैसे,
बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है।
और चलती और बढ़ती
और परतों पर कदम की थाप धरती।
बूँद बस अब रोशनी पर ही
नज़र अपनी टिकाती।
दूढ़ती बस रोशनी-
जो रोशनी कुछ देर को भी सरक जाती।
धैर्य में पकती हुई,
विश्वास से सजती हुई,
उस उजेली राह पर बढ़ जा रही है।
ऐसा लगता है कि जैसे,
बूँद, सागर की तरफ बढ़ जा रही है।
ये बड़ा सैलाब कैसा...!
और सागर जा समाया बूँद में ही!
बूँद का अस्तित्व सारा,
बह गया सैलाब के उन्माद में।
रोशनी की झिलमिलाहट
सूर्य की उज्ज्वल प्रभा में घुल गई।
वाद्य बजते बिन बजाए,
गीत गूँजे बिना गाए,
महक चंदन की बहे बिन वृक्ष के ही!
कमल खिलते, सहस्त्रदल में,
हंस सागर, धवल जल में
क्षीर नदिया में बहे, जलधार-से ही!
बूँद कैसी, कौन सागर!
भेद तो सारा ही जैसे मिट गया।
बूँद तो विस्तार पाकर,
संग सागर के कभी तट पर
मचलती, कूदती-
गहराइयाँ हो जा रही है;
ऐसा लगता है कि जैसे
'बूँद-सागर' दो नहीं, बह जा रही है!
१९१२२२/१९१२२२





