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स्वीकार भाव - अनहद की कलम से

स्वीकार भाव

एक- सब होते जाना है

सब होते जाना है।
स्वीकार भाव से देखो- क्योंकि
सब होते जाना है।
तुम्हारे अस्वीकार से
होना नहीं बदलता।
अस्वीकार से उपजे
प्रतिरोध से
तुम बढ़ा लेते हो,
अपने भीतर का संघर्ष,
और पाते हो कष्ट।

परिस्थितियाँ तो सिर्फ दिखती ही हैं;
अपने अस्वीकार से कर लेते हो तुम
उनका आलिंगन।
फिर कहते हो,
"दूर करो इन कष्टों को।"
एक बार स्वीकार कर तो देखो
परिस्थिति के दृश्य को,
फिर कहो,
क्या अनुभव होता है तुम्हारा!

दो- कुछ यूँ लगा…

कुछ यूँ लगा कि जैसे 
बहुत सावधानी से...
...नहीं...
बहुत सतर्कता से
देखते हुए चलना है!
उन परिस्थितियों के मोह-पाश से
स्वयं को बचाते हुए!
चलना है- उस स्वीकार भाव को
निरंतर धारण करते हुए।

जो हो रहा है
उसे होना मान स्वीकार करना है।
और जो कर रहा हूँ,
उसे भी होते हुए ही देखना है।
करना भी हो रहा है-
कुछ यूँ लगा!

२१०९१७/२१०९१७