मैँ चलता-दौड़ता,
लड़खड़ाता-गिरता,
फिर उठता,
चलता-दौड़ता-लड़खड़ाता-गिरता-उठता,
उस रास्ते के अंतिम छोर तक पहुंचता हूँ,
और पाता हूँ, कि वो रास्ता-
कहीं आगे, और कहीं नहीं जाता।
मैं असमंजस से भरता-ढूँढता,
रोता-बिलखता,
शांत होता-फिर ढूँढता-
और कुछ ना पाता-
सोचता ना जाने क्या-क्या!
कई प्रश्न जन्मते-उछलते-लड़ते-झगड़ते,
और कर जाते व्यग्र उत्तर की आस में!
“रास्ते का आगे ना जाना
कदाचित् रास्ते का अंत नहीं होता!
ना ही रास्ते के बन्द होने
या बढ़ते रहने को
जोड़ा जा सकता है,
रास्ता चलने कि उपलब्धि से!
रास्ते पर चलना ही करा देता है
बहुत कुछ उपलब्ध,
और उस रास्ते पर से लौट आना
कर देता है निश्चित एक नया मार्ग,
और फिर होती हैं उपलब्धियां,
उस नए मार्ग पर चलने मात्र से!”
और इन उत्तरों से
शांत ना रह पाने के बावजूद,
मैं भी कहाँ रोक पाता हूँ
सामने बढ़ती या पीछे या दाएँ-बाएँ जाती
राह पर चलना!
और यदि कुछ वक्त रोक भी देता हूँ
अपना चलना,
तो राह पर इस तरह रुक जाना भी तो
कदाचित् किसी राह पर
रुकते हुए चलने जैसा ही है!
तो मैं अब भी राह पर ही,
चलता-दौड़ता-लड़खड़ाता-
गिरता-उठता-फिर चलता-दौड़ता,
असमंजस से भरता-खोजता-
रोता-बिलखता-सोचता,
और पाता वही उत्तर बार-बार...
लगातार!
और लौट आता किसी नई राह पर,
या किसी पुरानी राह पर ही
चलने फिर एक बार!
२११०३१/२११०३१





