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राग और विराग - अनहद की कलम से

राग और विराग

ये क्या है, हमसफ़र होना
और फिर दूर हो जाना,
मिलना और राही से,
राह का फिर बदल जाना।

लगता यूँ कि जीवन भर,
रास्ते एक ही होंगे,
मगर मोड़ों पे, रस्तों से
मुड़कर दूर हो जाना।
ये क्या है, हमसफ़र होना
और फिर दूर हो जाना!

कभी मेरा ही मुड़ जाना,
कभी राही का खो जाना,
कभी मेरे, कभी उसके,
पाँव का रुख बदल जाना।
ये क्या है, हमसफ़र होना
और फिर दूर हो जाना!

मगर ये राग गहरा था,
बड़ी शिद्धत से आया था,
गीत का आखिरी सुर पर
ताल का यूँ बिखर जाना।
ये क्या है, हमसफ़र होना
और फिर दूर हो जाना!

साँस मेरी तो उसकी थी,
वो ही राहें दिखाती थी,
भरोसा टूटना देखा,
साँस का बस ठहर जाना।
ये क्या है, हमसफ़र होना
और फिर दूर हो जाना!

२३१२२७/२३१२२७