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एक अजन्मे को पत्र
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थोड़ा-थोड़ा - अनहद की कलम से

थोड़ा-थोड़ा

थोडा संशय, थोडा निश्चय,
थोड़ा-थोड़ा बढ़ना है;
थोड़ा धीरज, थोड़ा आतुर;
थोड़ा-थोड़ा गढ़ना है।

क्या बुनता है समय के भीतर,
इससे सब अनजाने हैं;
थोड़ा चलना, थोड़ा रुकना,
थोड़ा-थोड़ा चढ़ना है।

है असीम की कोई परीक्षा,
मन का कोई छलावा है,
थोड़ा कहना, थोड़ा सुनना,
थोड़ा-थोड़ा गुनना है।

मुझ पर क्यों विश्वास तुम्हारा,
परिचय तो आधा-आधा;
थोड़ी श्रद्धा, थोड़ा समर्पण,
थोड़ा-थोड़ा रमना है।

क्या है मेरी चाह लालसा,
क्यों मैं इतना खुल जाता;
थोड़ी प्रीति, थोड़ा सहारा,
थोड़ा-थोड़ा बहना है।

२३१२१०/२३१२१०