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अंतर्यात्रा का प्रश्न - अनहद की कलम से

अंतर्यात्रा का प्रश्न

ये जानते हुए भी कि ये गलत राह है,
मैं बेबस चलता हूँ इस पर,
क्योंकि और भी राहें
जो दिखती हैं आसपास,
वो भी तो सही नहीं जान पड़तीं!
और फिर ये इल्म भी नहीं-
कैसे मिल पाएगी मुझे सही राह!

चलता हूँ,
कि राह में रुक कर खड़े हो जाना भी
कोई विकल्प तो नहीं।
राह पर रुक जाने पर भी
राह तो चलती ही है-
कि राह सिर्फ दूरी ही नहीं,
बढ़ती है वक़्त से भी,
और वक़्त तो कहाँ रुका है कभी,
किसी राह पर कोई राही के लिए...!

तो कैसे मिल पाएगी मुझे सही राह,
जिस पर चल,
पा लूँगा अपनी मंज़िल...!

२४०२०९/२४०२०९