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कौन जाने किस सदी से! - अनहद की कलम से

कौन जाने किस सदी से!

वक्त के धागे जुड़े हैं
कौन जाने किस सदी से;
दिख रहा सागर यहाँ,
पर मिल रहा किस-किस नदी से।

लम्हा लम्हा यूँ सरकता,
यूँ सिसकता बढ़ रहा है,
कौन मानेगा जुड़े,
परमात्मा या उस नबी से।

आँख में धुँधली पड़ी पर
याद में पुरज़ोर काबिज़,
इश्क में रुसवाइयाँ
औ' आशिकी किससे निभी है।

जो कभी पूरा हुआ,
वो काम तो बस नाम का था,
ये हवा जो बह रही सदियों से,
आखिर कब थमी है।

तुमने उल्फ़त को कहाँ समझा
औ' जाना प्रीत क्या है!
बेवज़ा खुशियाँ औ' दिल की
टीस की अमृत कड़ी है।

रुकते-रुकते, थमते-थमते,
कब तलक यूँ ही चलोगे,
आरजू सागर की हो तो,
बेधड़क बहती नदी है।
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सत्य के कुछ फायदे,
नुकसान ही तौला किए हो,
ये ज़ेहानत ही वज़ा,
दुनिया में आवारा फिरे हो।

तुम नबी की नूर से वाकिफ नहीं,
बस बात करते,
उन नमाज़ों में कि जिनकी
आयतें चीखा किए हो।

तुमको दोनो हाथ से
ताली बजाना खूब आता,
नाद अनहद की कभी,
इक हाथ से कोशिश किए हो?!

और नदियों की कहानी,
दूर सागर दौड़ जातीं,
पत्थरों, उल्टी हवा से,
दूर तुम सहमे खड़े हो।

२४०७१२२४०७१५