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ये अरमानों की बस्ती है... - अनहद की कलम से

ये अरमानों की बस्ती है…

हजारों साल लगते हैं कि ये
इत्तिफ़ाक आने को,
किसी मजनू के मौसम में
किसी लैला के आने को।

ये नक्षत्रों, ये तारों का,
बड़ा मजमा लगा ऊपर,
तमामों उम्र तरसते हैं,
दो तारे साथ आने को।

तुम्हारे शौक असली हों,
मगर फ़र्ज़ी ये शै सारी,
लगा सीने से तुम बैठे,
कहें किसकी ये अय्यारी!

ज़रा सोहबत सुधारों तुम,
ज़रा सत्संग में बैठो,
ये साक़ी क्या परोसे है,
उसे चख कर ज़रा देखो।

सुरों में डूब जाता है,
उसे जो डूबता देखे,
जो डूबे में नही डूबे,
तैर संसार जाता है!

ज़मीं ये घूमती ख़ुद में,
घूमती गिर्द सूरज के,
बैठ कर इस ज़मीं पर ही,
असंख्यों मील चल आते।

उड़ाने इन परिंदों की,
तुम्हारे खाब से ऊँची,
साँझ पेड़ों की शाखों पर,
खुदी के घर को लौटेंगी।

दरकते खाब देखे हैं,
हुईं पूरी कई ख्वाहिश,
मगर इन ख्वाब-ख्वाहिश में,
फ़ना ये जिन्दगी होती।

माँग सिंदूर से भरने,
गज़ब करतब ये करते हैं,
रूह की खोज, ख्वाहिश को,
वक़्त के दाँव धरते हैं।

तुम्हे सूफी की आवाज़ें,
सुनाई दे गईं जबसे,
जहाँ के ग़म, खुशी तुमको,
यूं ही बेबात लगते हैं।

“ये बेदर्दी ज़माना है”-
तू मूरख क्यूँ समझता है!
ज़माने में है शामिल तू,
खुदी पर ज़ख्म करता है।

ये अरमानों की बस्ती है,
ख्वाहिशों की फसल होती,
तिरे भीतर जहां सबकुछ,
ना ख्वाहिश है, ना अरमां है!

बड़े जोशो-खरोशों से,
तू उसको घर बुलाता है,
वो रंग जाता मकां तेरा,
उसे अपना बनाता है;
तुझे पर जब तलक उसकी,
दगाई ख्याल आती है,
न घर तेरा, उसी घर में,
खुदी को कैद पाता है।

२५०२२१/२५०२२१