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एक अजन्मे को पत्र
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एक और पूर्णिमा चली गई- भाग १ - अनहद की कलम से

एक और पूर्णिमा चली गई- भाग १

विहराग्नि और आध्यात्मिक मिलन की तड़प

१९ जून २०१९

खंड-१: काल की लय

समय और काल का चक्र – “जीवन की निरंतर गति”

एक और पूर्णिमा चली गई!

पड़वा बीती, द्वितीया, तीजा,
और चतुर्थी बीत गई।
षष्ठी-पूर्व, पंचमी बीती,
सप्ती, अष्टमी चली गई।
नवमी बीती, दशमी बीती,
एकादशी भी बीत गई,
द्वादश, तेरस और चतुर्दश,
रात अमावस बीत गई।
दस के ऊपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस।

पूनम बीती, संग रात के
मास जेठ भी बीत गया।
कितने आषाढ़ों के बादल,
सावन-भादो सींच गया।
क्वाँर-कार्तिक, अगहन-पूसा,
माघ ठिठुर कर चला गया।
फागुन में फैला बासंती,
चैत, बिसाखा चला गया।
दस के ऊपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस।

मंगल की चौबीसों घड़ियाँ,
बुध के जैसे बीत गईं;
गुरू की पीली-पावन काया,
शुक्र-पूर्व ही चली गई।
शनि की काली देह-भंगिमा,
रवि आते ही बदल गई,
सोम बीतते सप्ताहों की,
अनगिन टोली चली गई।
दस के ऊपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस।

खंड २: प्रेम की पहली झलक

विरह और संवेग – “छुपा-छुपा प्रेम, पहली तड़प”

सही-गलत के पाट में पिसती,
रीत-नियम में ढली गई,
 'आँखों की महकी खुशबू'- सुन,
प्रीत-ग्लानि वन चली गई।

सुख-दुख खो बौराई कोयल,
कूके मिश्री डली गई,
कौन तान और कौन ताल वो,
प्रीत-पाश से छली गई।
दस के ऊपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस।

देह-प्राण की पिघली ज्वाला,
हिय के भीतर चली गई।
हिय में कैद जनम की कड़ियाँ,
द्वार लाँघ सब निकल गई।
आँख बंद चित्रों की छाया,
विरह रंग से रंगी गई।
सिसकी और आँसू में बहती,
विस्मय शंका चली गई।
दस के ऊपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस।
देखा उस दृष्य को बार-बार…
झिझकता-ठिठकता-सा प्रेम।
वो संन्यासी, में देवदासी--
कहाँ कोई मेल जो कह सकूँ उसे,
अपने हृदय की बात।
बस चुपचाप देखती ही तो रहती थी
देहरी पर खड़े हो--
अध-खुले झरोखे की ओट से,
अपने प्रेम-पात्र को।

कैसा तो भीतर सब पिघल जाता था
उसको यूँ ही छुप-छुप के देख!
कभी तो धीरे-धीरे,
चुपके-से...
उसे पीछे से भींच लेने का मन होता...।
और मन-ही-मन
भींच ही तो लेती थी कितने ही बार...!

कितने ही बार भिगोया था
मैंने स्वयं को उसके आलिंगन में--
अपने ही स्वप्न में...!
"क्या ये कभी सत्य हो सकेगा...?"
इस भाव में भी कितनी तड़प थी--
कितनी व्यग्रता, कितनी व्याकुलता..!
और फिर आँसुओं की अनियंत्रित श्रृंखला…।

उसका ध्यान-मग्न बैठना,
कितनी पुलक से भर देता था मुझे…!
यूँ लगता था कि जैसे
अपने भीतर वो जाता है-
कहीं मुझसे ही होकर!
कितना-कितना मैं अनुभव करती थी
उस कंपन को...
और डूब जाती थी
उसी-अज्ञात, अनाम अनुभव में...।

"क्या जानता है वो, मेरे इस प्रेम को?"
क्या अनुभव करता है वो भी,
मेरी ही तरह-- मीठी टीस देती,
पिघलती वेदना को?"
न जाने कितने अनगिन बार,
मैं यही सोच लजाई थी…
और फिर दौड़ कर निकल भागी थी
अपनी देहरी पर--
देखने उसको झरोखे की ओट से...।

खंड- ३: याचना और वेदना

जीवन, प्राण और मुक्ति की पुकार – “मन की पीड़ा और प्रभु से संवाद”

मैं तो यूँ ही जी लेती--
चुपचाप,
प्रेम की उस अग्नि में
धीरे-धीरे… तपते… पिघलते...!
जी लेती यूँ ही उसे छुप-छुप के देखते।
किंतु यह क्या...!
क्या मेरा यूँ देखना भी
नहीं था स्वीकार, प्रभु को…?
क्या नहीं रास आया
मेरे इस प्रेम का इतना अबोध,
अप्रगटन भी...?
इतने निर्दयी कैसे हो सकते हो,
प्रभु!

कितनी विवश थी मैं;
उसकी निष्प्राण-देह को देखती,
अपने ही भीतर चीत्कार करती...
किंतु बाहर? मूक... मौन...!

वो दृष्य अब भी घूम जाता है,
मेरी आँखों में बार-बार।
और फिर?
मैं स्वयं भी निष्प्राण-सी ही,
घूमती-भटकती...
रोती-बिलखती...
जीवन को जैसे ढोती-सी...
या कि जीवन के पीछे
विवश-घिसिटती-सी...।

मेरी वेदना से पसीज उठता था,
वो वट-वृक्ष--
वो साक्षी था,
मेरे निरंतर बहते अश्रुओं का
और मेरी करुण पुकारों का--
जो मैने की थी,
उस कुछ खंडित-से
शिवलिंग के समक्ष-- असंख्य बार!

कैसा तो चीत्कार कर उठता था
मेरा हृदय उसे याद कर--
उसके पदार्पण पर
देहरी पर आते उसके पाँव,
"हाँ, यही तो प्रथम दर्शन थे,
उस दूर-भूमि से आए उस साधक के..."
उन पाँवों ने जैसे मेरे भीतर को
कुछ अलग गति ही दे दी थी--

... "प्रेम?"

"किंतु क्या कोई देवदासी भी
रखती है प्रेम का अधिकार?"

"क्यों? क्या नहीं होता
किसी देवदासी के भीतर,
एक स्त्री का हदय?!"

कितना कुछ विवाद
अंतर से ही किया करती थी...!
किंतु अब तो
नहीं है शेष कुछ भी...
है तो सिर्फ असह्य वेदना!
"अब और निर्दयी ना हो प्रभु! 
जो ले लिए इस जीवन से प्राण ही,
तो क्यूँ फिराते हो इस जीवन को भी?
क्यूं ले लेते नहीं,
ये श्वास, ये धड़कन भी?
क्यूँ छोड़ देते हो इस हृदय को,
इस अपार विषाद के
महासागर में डूबते रहने को?"

“प्रभु, मुक्त कर दो मुझे
इस निरुद्देश्य, निरर्थक,
थके हुए, निस्तेज जीवन से।
सुन लो मेरी ये पुकार,
परमात्मा, सुन लो...!"

रोज़ रोज़, दिनों-दिन
बस ये ही रुदन...।
किंतु, क्या कोई आता है
मेरी पुकार सुन मुझे लेने,
या कि मुझे स्वयं ही करना होगा
इस वेदना से मुक्त
अपने आपको...?

और वो ही तो किया था…
स्वयं ही उस वट-वृक्ष से
अपने ही वस्त्र बाँध...
चल दी थी छोड़
इस संसार को।

और वो चित्र भी घूम जाता है
अब भी, आँखों में बार-बार।

खंड-४: प्रेम और दिव्यता

अभिव्यक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक ज्वाला – “समर्पण और परमात्मा की कृपा”

किंतु ये वेदना, ये विह्वलता
तो अब भी साथ ही थी।
उस देह से निर्गम कर भी
कहाँ ठौर था?
कहाँ मुक्ति थी?

... किंतु ठौर तो था,
दिखती थी जहाँ से,
मुक्ति की परछाई-सी,
जो धीरे-धीरे हो आई थी
कुछ अधिक स्पष्ट।
वो पुकार,
जैसे कोई सुनता-सा, प्रतीत होता था।
भान होता था कि
कोई कुछ कहता भी है।

प्रेम के आर्ततम स्वर को
कोई अन्य हृदय
मिलता-सा प्रतीत होता था।
"प्रभु मेरा जीवन उस बिन जैसे,
बिनु पानी के मीन-
नहीं, मैं जी नहीं पाऊँ,
तड़प, मैं सह नहीं पाऊँ।

मुझे दे दो वरदान, कभी
प्रभु विलग न हो दो प्राण--
काल कभी हर ना पाए,
बूँद सागर मिल जाए।

जो बिधि कारक हो कह दो,
तुम कृपा करो भगवान-
वसन मैं सब तज दूंगी,
जतन अर्पण कर दूँगी।"

"मानवी, तुम मोह की
ज्वाला में रक्तिम तप्त हो!
दिव्य-द्रव्यों को ग्रहण कर,
क्यूँ ना देवी तृप्त हो?
सृष्टि में इतने विलक्षण,
रूप-गुण फैले हुए,
त्याग कर वैभव-प्रभा,
नर एक पर आसक्त हो!"

"प्रभु, मुझे प्रभा-विभा ना दिखती,
प्रभु, मुझे सृष्टि-वृष्टि ना दिखती।
प्रभु, मुझे दिव्य-द्रव्य ना सुहाते,
कृपा करो प्रभु, क्यूँ तड़पाते!”

"तुम कहो, वैकुण्ठ के
प्रासाद की शोभा रहो,
या कि पृथ्वी पर प्रबलतम
राज की रानी रहो।
तुम कहो सिद्धी सभी,
शक्ति तुम्हें सब दान दें,
'नर'- उसे छोड़ो, कहो
जो भी तुम्हे प्रिय अन्य हो।”

मौन थी, इस उस मौन में ही
सिसकियाँ बहती गईं,
सिसकियों के साथ,
हिरदय से भी झरनी बह गई।
"हा प्रभु, क्या तुम भी मेरी
पीर को समझे नहीं,
औषधि कैसी सुझाई,
वेदना बढ़ती गई।

क्या युगों से प्रेम के सागर
में अमृत-पान कर,
भूल ही बैठे, प्रभु,
ये वेदना कितनी प्रखर!"
या विवश प्रभु भी,
ना कोई औषधि, उपचार भी,
ठौर, मृगतृष्णा ही थी,
ना मुक्ति की कोई डगर।

कहाँ जाऊँ, द्वार किसके,
ज्ञान अब कुछ भी नहीं,
ईशवर के परे शक्ति,
भान ये कुछ भी नहीं।
सोचती अब पाँव को,
अपने दिशा किस ओर दूँ?
सर्व संज्ञा-शून्य,
भीतर चेतना किंचित नहीं।

हारकर थककर शिला पर,
मूर्छित-सी ही पड़ी,
कौन जाने, काल-सदियाँ,
बीतती कितनी घड़ी?
देह की इच्छा नहीं पर,
देह बिन भी पीर ही,
वेदना असह्य उसमे
बेबसी, जुड़ती कड़ी।

"हे प्रभो, क्या प्रेम का,
ये ही फलित परिणाम है?
बेबसी और वेदना,
अंतर महा-संग्राम है।
कौन जीता, कौन हारा,
जीव तो असहाय है,
रक्त से लथपथ हृदय,
ये कौन सा सुख-धाम है!"

प्रार्थना किससे करूँ,
ध्वनि कौन सी प्रभु पार की
कौन दिस, कैसे बजाऊँ,
घंटियाँ किस द्वार की?
कोई पगडंडी कहीं,
जिस पर स्वयं को ढाल दूँ,
कौन माझी, कौन नौका,
डूबते संसार की?

खंड ५: सृष्टि और अस्तित्व

सृष्टि और मानव का संबंध – “प्रकृति, नियम और चेतना का दर्शन”

यूँ ही गुनते, यूँ ही बुनते,
कितने सूरज ढल गए,
कितने ही बादल यूँ बरसे,
कितने मेघादल गए।
कितने ही हिमखंड बिखरे,
कितने ही उत्तुंग हुए,
कितनी कलियाँ फूल बनती,
कितने तरुवर फल गए।

वेदना हर पल ही रहती,
किंतु कुछ अवकाश भी,
धरा, नदिया, सूर्य, वायु,
ताकती आकाश भी,
मेघ उपजे सागरों से,
सागरों में जा मिले,
सृष्टि है ये, सृष्टि चलती
और उसका नाश भी।

बीज फल से, बीज से तरु,
रूप बदले त्याग कर,
बीज तरुवर बन सके क्या,
जो स्वयं से राग कर!
टूटती-घिसती शिलायें,
रेणु कल पाषाण थे,
पर्वतों के शीश उठते,
रजकणों के राग पर।

अचकचाई देखती,
अस्तित्व के विन्यास को,
आज के कल, कल के अब में,
रूप के संन्यास को,
इस बिखरते और जुड़ते
चक्र के संघर्ष में,
वेदना करती समर्पण,
नवल के उल्लास को।

क्या है इस संघर्ष और
उल्लास की कड़ियाँ कहाँ,
दीखती विपरीत, इन को
जोड़ती लड़ियाँ कहाँ?
कुछ तो है निस्वार्थ से,
अदृष्य हो सब बुन रहा,
अनवरत विस्तार में,
विश्राम की घड़ियाँ कहाँ?

श्रम बड़ा, श्रमजल की किंतु
बूँद भी दिखती नहीं,
थामता ये कौन ऋतुएँ
काल से डिगती नहीं।
देश-देशांतर भी जिसकी
सीम से बढ़कर नहीं,
कौन ये निर्देह, निर्गुण
शक्ति जो चुकती नहीं।

प्रश्न जिज्ञासा हुए,
उत्तर की तृष्णा बढ़ रही,
वेदना निज-गौण, व्याकुलता
परम-शिख चढ़ रही।
कौन है जो सृष्टि के,
हर बिंदु को जोड़े हुए?
संयुक्त हो, किस शक्ति से,
हर सरित सागर बढ़ रही?
प्रश्न उठते और बिखरें,
शोर और अनुनाद कर,
प्राण छोड़ें-- हो निरुत्तर,
वाद और प्रतिवाद कर।
शब्द की सीमा हुई और
मौन मुखरित हो गया,
सत्य की झलकी दिखी,
एकांत से संवाद कर।

"सृष्टि के संबंध देखो,
तुम भी उसका अंश हो,
क्या नहीं संतान उसकी,
क्या न उसका वंश हो?
क्या नहीं तब सृष्टि का
तुम भी व्यवस्थित अंग हो?
नित-नवल, जीवन-सृजन,
उत्थान हो या भ्रंश हो?"

गुद‌गुदे झोंके पवन के,
झूमते तरुवर औ' मैं,
बह रहा शीतल सरित-जल,
कूकते खग और मैं,
देखकर खिलती कली को,
खिल गया मेरा हृदय,
कूदते मृग-छौन,
पुलकित भाव में मृग और मैं।

जो जुड़े हैं भाव सारे,
जो जुड़ी है श्वास भी,
भिन्नता की रूप छवि में,
एकता का वास भी।
जो सवेरा, दोपहर और
साँझ में ढलता रहा,
रात्रि के ही गर्भ में
चमका, कहो आभास भी!

दिख रही है श्रृंखला
विघटन, पुनर्निमाण की,
चल रहा कितना व्यवस्थित,
हानि ना परिमाण की।
किंतु इसका अर्थ निश्चित,
तत्व सब भागी रहे,
"मैं भी इसकी ही कड़ी”,
उह, ग्रंथि खुलती प्राण की!

मैं जुड़ी हूँ सृष्टि से और,
सृष्टि के निश्चित नियम,
अर्थ इसका घटन और विघटन,
मेरा भी सत्य-क्रम,
देह बनती, देह घुलती,
ये समझ तो खुल रही,
देह का मिटना ही सच,
क्या है यही मृत्यु धरम?"

शीशहीन भाल पे
विभ्रांति रेख कढ़ रहे,
शांत-सी नद पर अचानक,
भ्रांत-भंवर बढ़ रहे,
"देह मेरी धूल, वायु, जल,
पवन, आकाश में-
मिल गई तो- कौन हूँ मैं?"
द्वन्द्व पर्वत चढ़ रहे।

देह छूटी आकृति
मेरी विसर्जित हो गई,
भाव के जीवन की किंतु
शक्ति ऊर्जित ही रही।
कर रही अनुभव हृदय की
वेदना और पीर का,
प्रेम की रसधार
स्मृतियों में संचित हो गई।

किंतु क्या इसका प्रयोजन,
क्या कोई उपयोग है?
त्याग कर इसको है बढ़ना,
या कोई उद्योग है?
क्यूँ थमी हूँ, क्यूँ बही ना--
क्या नयी ये राह है?
बोध से आई यहाँ पर,
या कोई संयोग है?
कुछ हटी तन्द्रा-सी जैसे,
प्रश्न की बौछार से,
ये क्या अनुभव-सा हुआ,
लौकिक के जैसे पार से,
कौन था, उपदेश,
मुझको दे रहा आकाश से,
या कि कोई बोलता,
हिरदय के अंतर द्वार से?

मार्ग याद कर रही
मैं काल के बहाव में,
मोड़ ये ही चल पड़ी मैं,
राह के चुनाव में।
देह छोड़, देह दूसरी ही
जबकि लक्ष्य है,
क्यूँ निःसंग में खड़ी,
बहाव के कटाव में!

मनपटल पे चित्र
राह के स्पष्ट बन रहे,
देह छोड़, वेदना-विलाप
स्वर प्रबल रहे।
याचना भगवान के सम्मुख
खड़ी मैं कर रही,
प्रेम माँगती रही,
वो दान सर्व कर रहे!

निर्जीव-सी पड़ी हुई,
मैं भ्रांत, बुद्धि-हीन सी,
प्रभु-कपाट बंद देख,
वेदना असीम-सी।
बेबसी चरम हुई,
तो द्वार कोई खुल गया,
सत्य की झलक दिखी,
कृपा प्रभु असीम थी।

खंड 6: साधना और धीरज

धैर्य, प्रेम और परमात्मा की कृपा – “साधना और दिव्यता में मार्गदर्शन”

"हे प्रभु, मैं देह धरती हूँ,
अलग हर जन्म में,
अर्थ इस का, देह उसकी भी
नयी, नव-जन्म में।
जानती ये सत्य ना थी,
याचना तन की रही,
प्रार्थना किस कर फलित हो,
जो नहीं रित-धर्म में।

"हे प्रभु, व्याकुल बहुत,
उसका विरह सहता नहीं,
देह-बिन भी ध्यान में,
उसके सिवा बसता नहीं।
वेदना ये शांत कैसे,
हो सके प्रभु युक्ति दो,
हे प्रभु, निर्देह ही
जीवन ये तर सकता नहीं?”

"मानवी, तुमने किए,
अनुभव सृजन के सत्य के,
हो रही रचना-विरचना
किस तरह अस्तित्व में।
किंतु ये तो अंश केवल,
सत्य तो विराट है,
ज्ञान के अभाव में ये
जीव-मोह व्यक्त है।

"वस्त्र जीव के चुनों,
वरदान तुम को है यही,
रूप, गुण, जो भी रुचे,
अवरोध तुमको है नहीं।
तुम कहो किस गर्भ में,
संतान रूप जन्मना,
विस्तार, वेग तुम कहो,
गतिरोध तुमको है नहीं।"

"ज्ञान से विरक्त हूँ,
ना प्रेम, मोह भेद है,
सत्य साक्षी हृदय में,
वेदना उद्वेग है।
रूप-गुण ना कुछ रूचे,
ना गर्भ देह चाहना,
याचना करती प्रभु,
वो प्रार्थना ही शेष है।

"हे परमात्मा, मुझको अपने,
प्रेम-पात्र से मिलवा दो,
देह रहे या ना परमात्मा,
भेद तनिक भी मिटवा दो।

कभी मृत्यु की काली छाया,
शीश हमारे छा जाए
हम विच्छेद ना हो पाए प्रभु,
प्राण हमारे घुलवा दो।

"हे परमात्मा, कहो कहाँ
किस देह-रूप में जाना है,
या निर्देह और निरूपा,
उस निर्देह समाना है।

जो आदेश प्रभु कर दोगे,
मन-अंतर स्वीकार करूँ,
ना विलंब क्षण एक करूँ
प्रभु, अपना सर्व गँवाना है।

"तुम चाहो प्रभु, हिय को मेरे,
प्रेम कसौटी कस लेना,
अणु-भर भी जो कम रह जाए,
सारी शक्ति हर लेना।

प्रेम पर अपने परमात्मा,
विश्वास तुम्हे दिलवाती हूँ,
व्यर्थ नहीं जाएगा वर ये,
प्रभु संकल्प जताती हूँ।”

"मैं संकल्प तुम्हारा समझूँ,
तुम कठिनाई नहीं जानो,
राह नहीं आसान ये पुत्री,
अर्थ नहीं इसका जानों।
कर पाओ तो बड़ी साधना,
निश्चित द्वार अमर पाओ,
मृत्यु-तुल्य है कष्ट राह में,
विरह-वेदना कम जानो।"

"हे परमात्मा। प्रेम-अगन ये,
मुझको झुलसा जाती है,
मृत्यु वरण की स्वयं विरह में,
पीर असह्य हो जाती है।

सह लूँगी सब कष्ट स्वयं,
पर एक प्रार्थना करती हूँ,
परमात्मा तू सदा रहेगा साथ,
याचना करती हूँ।"
"प्रेम-शक्ति इस महा-विराट में,
मेरा ही विस्तार रहे,
पुत्री, प्रेम जहाँ भी झलके,
समझो, प्रभु का द्वार रहे।
अपने सुख, मुझ पर अर्पित कर,
कष्टों को स्वीकार करे,
प्रेमी ऐसा ही प्रिय मुझको,
प्रेम स्वयं निस्तार करे।

"विकट बड़ी कठिनाई इसमें,
तुमने जो माँगा मुझसे,
नहीं तुम्हारा जीवन केवल,
उसका भी जीवन बदले।
प्रेम-पात्र का अपना जीवन,
दिशा-दशा उसकी अपनी,
उसके फल, उसकी इच्छा पर,
हम अधिकार नहीं रखते।"

"हे परमात्मा, संभव क्या ना,
जीवन उसका ना बदले?
मैं विलीन हो जाऊँ उसमें--
सागर में सरिता पिघले!

कितनी नदियाँ मिलती हैं,
सागर की अपनी गहराई,
सरिता कोई, हे परमात्मा,
सागर का रूप बदल पाई?”

"नदियों को गले लगा लेना,
सागर की यही प्रवृत्ति है,
पाने सागर का आलिंगन,
नदियाँ उस ओर उमड़ती हैं।
नरश्रेष्ठ, समुंदर हो जाता,
पा जाता तब इतनी शक्ति,
ना कंपित हो जीवन-ज्योति,
ना जीवन दिशा बदलती है।

"प्रिय-पुरुष नहीं, लेकिन तेरा,
पुत्री, आलिंगन कर पाए,
इतनी सामर्थ्य नहीं उसमें,
जो तपन प्रेम की सह पाए।
पर तथ्य एक आशा जिसमें-
वो मोहजाल से छूट रहा,
व्याकुलता जो सच दूढ़ रही,
इस प्रेम-ज्योति में दिख पाए।

"अपनी तृष्णा से विवश हुआ,
उसने नव-देह नहीं धारी,
व्याकुल वो समझ नहीं पाता,
उत्कंठा तीव्र, सघन, भारी।
पर जाल वासना के भी हैं,
फल, कर्मों के भी शेष रहे,
उसको भी मार्ग-दृष्टि वर दी,
जो अग्नि बन रही चिंगारी।

"उसकी दृष्टि अब सूक्ष्म हुई,
वो कर्म, वासना जान रहा,
फल, सब कर्मों का निश्चित है,
ये सत्य उसे अब भान रहा।
दीर्घ वासना जीनी हैं,
लघु-क्षणिक वासना जल जाती,
जीना अब सुधि मे ही रखकर
धुंधला-धुंधला आभास रहा।”

खंड- ७: समय और समापन

काल का प्रवाह और अनुभव का प्रतिबिंब – “समापन और विश्वास”

"हे परमात्मा, इस निरीह पर,
इतनी करुणा बरसा दी,
धन्यवाद किस मुख से बोलूँ,
मेरी बगिया महका दी।

"कृपा करो अब हे परमात्मा,
मुझको तुम आदेश करो,
किस वन करना वास प्रभु,
और किस पल पुष्पित हो डाली?"

"अभी प्रतीक्षा ही करनी है,
धीर धारना है तुमको,
भीतर शक्ति और भरे तब,
देह धारना है उस को।
कर्मों के फल, जिस सीमा तक,
सहन कर सके इस तन में,
साक्षी हो, धीरज धरना है,
यही साधना है सुन लो।

"देह त्याग उस जनम-काल की,
फिर शरीर वो पाएगा,
तुम भी देह-रूप जाओगी,
साथ तुम्हारा पाएगा।
पाओगे तुम मित्र-शत्रु जो,
पूर्व जन्म संग भोगी थे,
एक-दूजे के दर्पण बनकर,
इच्छा-फल तज जाएगा।"

"हे परमात्मा, मेरी तो अब,
इच्छा बस इक शेष रही,
ना कंचन, काया की इच्छा,
और पराये द्वेष नहीं।

"फिर इच्छाओं के तजने की
बात बुद्धि ना आ पाई,
सुनकर विवरण दीर्घमार्ग का,
घोर व्यग्रता बढ़ आई।

"रख पाऊँगी धीरज इतना,
मैं तो निपट अकेली हूँ!
छूना है आकाश, धरा की
नन्ही बेल-नवीली हूँ।"

"इक छोटी चींटी भी कितना,
गज को व्याकुल कर देती,
दबी वासना, रेणुमात्र भी,
मन को आकुल कर देती।
आकुलता अवरोध बन रहे,
प्रेम गति तब थम जाती,
प्रेम वही विस्तार पा सके,
नहीं वासना घर रहती।

"सच कहती हो दीर्घमार्ग पर,
धीरज सरल नहीं होता,
किंतु महादेव ना पाते, वैभव--
गरल नहीं होता।
सृष्टि की अपनी मर्यादा,
न्याय-नियम त्रुटिहीन रहें,
दिख जाती अति-सूक्ष्म वासना,
उसको भरम नहीं होता।

"अपने को निर्बल ना जानो,
ना ही निपट अकेली हो,
नन्ही बेल, नवेली निश्चित,
प्रेम-शक्ति अलबेली हो।
परमात्मा की कृपा बरसती,
ये वरदान स्वतः पातीं
सदा संग परमात्मा बसते,
प्रिय जो प्रेम हठीली हो।

"निश्छल प्रेम तुम्हारा पुत्री,
यही जानकर कहते हैं,
अंतर में गुरु सदा विराजे,
तुमको ये वर देते हैं।
करो समर्पण तुम उन पर वो,
तुमको मार्ग दिखाएंगे,
उसको भी अगले जीवन में
वो सत्मार्ग बताएंगे।"
दुनिया है चलती जाती है,
उसका अपना वेग-प्रवाह।
हम नौका और समय खिवैया,
समय नदी और समय बहाव।

उसी समय की बातें कितनी,
बतलाकर हमें चले ‘सुहास’,
आगे की अद्‌भुत-सी गाथा,
कभी कहेंगे वो इतिहास।

आँखे कितनी गीली होती,
होठ कभी खिल-खिल जाते,
परमात्मा की लीला लेकर,
फिर हम और कभी आते।

जेठा की पूनम हिय-सागर
ज्वार उठा कर चली गई।
सागर-जल, बादल में भर कर,
ग्रीष्म ऋतु भी चली गई।
सागर, मेघ आलिंगन, पृथ्वी
प्रेम की शैया बनी हुई,
सूर्यग्रहण में चाँद दिखाकर
और अमावस चली गई।

दस के अपर तीन बरस,
पाँच माह कुछ और दिवस॥

०३ जुलाई २०१९