प्रेम-पात्र की आध्यात्मिक यात्रा- गुरु-मिलन
२५ फरवरी २०२४
खंड 1: काल की लय
समय और काल का चक्र – “जीवन की निरंतर गति”
एक और पूर्णिमा चली गई।
पड़वा बीती, द्वितिया, तीजा,
और चतुर्थी बीत गई।
षष्ठी पूर्व, पंचमी बीती,
सप्ति, अष्टमी चली गई।
नवमी बीती, दशमी बीती,
एकादशि भी बीत गई,
द्वादश, तेरस और चतुर्दश,
रात अमावस बीत गई।
दस के उपर आठ बरस,
एक माह कुछ और दिवस।
पूनम बीती संग रात के
माघ मास भी चला गया।
कितने फागुन की हिय प्यासें,
चैत-बिसाखा बढ़ा गया।
जेठा की गर्मी हिय-सागर,
आषाढ़ों में मेघ हुआ;
सावन-भादों की वृष्टि में,
सागर-अंबर एक हुआ
क्वाँर-कार्तिक शीतलता का
संदेसा लेकर आए;
अगहन-पूसा सारे सागर,
हिम के जैसे जमा गए।
दस के उपर आठ बरस,
एक माह कुछ और दिवस।
शनि का न्याय कर्म का चक्रा,
रवि की धूरी घूम गया;
चंद्र-रात्रि की मादकता से,
मंगल बल भी झूम गया।
बुध का स्वागत और विसर्जन,
फिर गुरु का विस्तार हुआ;
शुक दिवस के सुख-चक्रों में,
काल-वृत्त निस्तार हुआ।
दस के उपर आठ बरस,
एक माह कुछ और दिवस।
खंड २: संन्यास और संसार
“संसारी और संन्यासी- डोलता मन”
बंजारों-सा डोल रहा मैं;
संसारों की टोली में।
संसारी बन कभी कमाता,
और डालता झोली में।
कभी कमंडल भीतर उगता,
कभी झोलियाँ खुल जाती।
कभी कमंडल झोली में और,
झोली खाली दिख जाती।
मैं संन्यासी, मैं संसारी,
राह-राह मैं डोल रहा।
कभी चहकता, कभी सुबुकता,
पानी, पारा घोल रहा।
दस के उपर आठ बरस,
एक माह कुछ और दिवस ।
बनता और बिगड़ता, बनता,
पर-जन्मों का प्रेम प्रवाह।
कभी अचानक रुक जाता है,
तीव्र वेग-सा सरित बहाव।
कभी मिला सानिध्य गुरु का,
पथ पर चलना सरल रहा।
कभी गुरु की कृपा, कोप में
बदली, हिरदय गरल रहा।
ये समझूँ जीवन में क्षण-क्षण,
नहीं समर्पण कर पाता।
जान रहा प्रतिबिंब कहाँ हो--
दर्पण ही जो ढंक जाता!
द्वार बंद या खुली खिड़कियाँ,
आँखे समझ नहीं पाती,
जान नहीं पाता रवि-किरणें,
भीतर हैं या ना-आती।
इसी भ्रांति मैं पग-पग चलता,
बड़ी व्यग्रता बढ़ जाती,
बढ़ता हूँ मैं, रुका हुआ या,
धरती पीछे को जाती!
१९ मई २०२४
खंड ३: अहं-संघर्ष और अक्रम-ज्ञान
“कर्म, अहंकार और अक्रम-ज्ञान की अंतर्दृष्टि”
दस के ऊपर आठ बरस,
अब चार माह कुछ और दिवस।
पीछे को परछाई मेरी,
मुड़ा तो आगे आ जाती,
पूर्वजन्म की अहम वृत्तियाँ,
कर्म-उदय बन छा जातीं।
कर्मों का निष्पादन करने,
जो निमित्त बन आ जाते,
अहंकार के उठ जाने पर,
कर्मबीज फिर पड़ जाते।
स्थितियाँ कोड़े बरसाएँ,
मुकुट शीश पर सज जाते,
बुद्धि बताए लाभ-हानि और,
बंधन में बँधते जाते।
जनम-जनम मन के विचार के,
चित्त, चित्र गढ़ता जाता,
'बुदि-अहम' के दुश्चक्रों में,
जीता और मरता जाता।
दस के ऊपर आठ बरस,
चार माह कुछ और दिवस।
ये कथाएँ तो कर्मचक्र की,
बरसों से सुनता आया;
किंतु नहीं हिय की ज्वाला में,
शीतल-सा अनुभव पाया।
गुनते-गुनते शायद,
संचित वाणी भीतर बैठ गई,
विरह-वेदना बरस-बरस की,
अंतरतम को भेद गई।
मोह, अपेक्षा और आश्रय के,
जटिल-जाल टूटे बिखरे,
हृद के भीतर आर्त-नाद से,
अंतर के दर्पण निखरे।
करुण-प्रार्थना, विवश-समर्पण,
आकुल-क्रंदन, प्राण थमें।
कृपा प्रभु की बरसी झीनी,
आप्त-वाणी सुन ध्यान रमे।
क्लेश पिघलता बिन कारण के,
अंतस किंचित खुल पाता,
नित्य सवेरे और साँझ को,
गुरुवाणी सुनने आता।
मन-बुद्धि में भेद करा के,
अहंकार को बहलाकर,
दादा-वाणी हुई प्रतिष्ठित,
अक्रम ज्ञानविधि पाकर।
संवत् अस्सी, फागुन मासे,
शुक्ल अष्टमी रविवारे।
चौबीस सन् और मार्च माह में,
दिवस सप्तदश गुरु द्वारे।
दस के ऊपर आठ बरस
चार माह कुछ और दिवस।
खंड ४: दादा-वाणी, ज्ञानविधि और साधना
“दादा के वचनों से मिलने वाला व्यवस्थित अभ्यास एवं शुद्धता”
कालचक्र की लीलाओं से,
मन चकरा-चकरा जाता,
क्या विधान लिख दिया विधि ने?
--समझें, समझ नहीं पाता।
दो घंटे की ज्ञानविधि में,
जटिल ज्ञान अंतस छाया,
जनम-जनम क्रम में ना मिलता,
क्षण में अक्रम से पाया।
पाँचाज्ञायें, चरणविधि और
नौ-कलमें गुनते जाना।
भूल हमारी-- नहीं किसी की,
‘क्षमा-क्षमा' कहते जाता।
ज्यों-ज्यों हमको भूले अपनी,
और-और दिखती जाएँ--
बढ़ी जागृति ऐसा जानो,
निकट मोक्ष नियति लाए।
'शुद्धात्मा हम'-- नित्य यही है,
शेष विशेषण भ्रम जानो।
सभी विनाशी, सभी वियोगी,
संसारी का क्रम जानो।
जो सत मेरा, वही सभी का,
शुद्धात्मा सब को जानो।
भूलें मन की, पूर्वजन्म की,
वर्तमान निर्झर मानो।
कहो गलतियाँ अहंकार की,
तुरत प्रतिक्रमण कर डालो।
पुनः नहीं हो ऐसी भूलें,
परम शक्ति प्रभु से माँगो।
दस के ऊपर आठ बरस,
अब चार माह कुछ और दिवस।
खंड ५: दादा भगवानना असीम जय-जयकार हो
“दादा-स्मरण, आज्ञाएँ और जागृति का विज्ञान ”
"दादा भगवानना असीम जय-जयकार हो,
दादा भगवानना असीम जय-जयकार हो,
दादा भगवानना असीम जय-जय कार से
दादा भगवानना असीम जय-जयकार हो।"
दादा सब के भीतर बैठे,
जय-जय उनकी तुम गाओ।
गाते-गाते ही तुम उनके,
साथ-साथ घुलते जाओ।
भीतर एक सापेक्ष तुम्हारा,
क्षणभंगुर उसको जानों।
कर्म-निर्झरा तुम करने दो,
खुद से जुदा उसे मानो।
भरा हुआ जो पूर्वजन्म का,
उसको पिघल निकलने दो।
सभी फ़ाइलों का निपटारा,
समभावों से करने दो।
ना मन से, ना वचन देह से,
किंचित दुख ना दे पाओ।
स्यादवाद, वाणी और वर्तन,
मनन की शक्ति पा जाओ।
दस के ऊपर आठ बरस,
चार माह कुछ और दिवस।
खंड ६: सद्वचन, शीतलता और समापन
काल का प्रवाह और अनुभव का प्रतिबिंब – “समापन और विश्वास”
सदवचनों की परम-शक्ति से,
परमाणु बदले जाते।
अनुभव, दर्शन और ज्ञान से,
बाहर दिशा नई पाते।
दादा की आज्ञा में रहकर,
वीतराग विज्ञान गुनो।
केवल शुद्धात्मा का अनुभव--
नहीं विनाशी-- योग चुनो।
श्री सीमंधर स्वामी, दादा,
चौबीस तीर्थंकर, भगवंत,
ॐ, पंच परमेष्टि, साहिब,
नमस्कार, कृष्णा, अरिहंत।
जपते-पढ़ते पारायण को,
सुनकर कुछ पिघला जाता।
बुद्धि बूझ पाती, ना पाती,
अहंकार गलता जाता।
वर्तमान तो किंचित शीतल,
भावी और सहज होगा।
दादाजी के आशीषों से,
'केवल ज्ञान' सफल होगा।
दुनिया है चलती जाती है,
उसका अपना वेग प्रवाह;
हम नौका और समय खिवैया,
समय नदी और समय बहाव।
वर्तमान की बातें इतनी,
बतलाकर हम चले 'सुहास',
आगे की अद्भुत गाथा हो,
भीतर ये रखते विश्वास।
आँखे कितनी गीली होंगी,
होठ कहाँ खिल जाएंगे?
परमात्मा की लीला लेकर,
और कभी फिर आएंगे।
माघ मास पूनम हिय भीतर,
ज्वार थामकर चली गई,
धरा, वात के ताप बढ़ाती,
ग्रीष्म ऋतु गंभीर हुई।
धरती, मेघ पुकारे आकुल,
आस नीर की भरी हुई।
वैशाखी की बुद्ध पूर्णिमा,
शून्य-शून्य-कर, चली गई।
दस के ऊपर आठ बरस,
चार माह कुछ और दिवस।
२४ मई २०२४





