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एक अजन्मे को पत्र
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केदारनाथ-२- वन और हमारी साँसें - अनहद की कलम से

केदारनाथ-२- वन और हमारी साँसें

यहाँ-

माँ ने बेटे को प्यार से
लोरी गा, सुलाया,
और फिर प्रेम से उसको
निहारती रही...
देर तक-
"नन्हा-नन्हा-सा चेहरा,
नन्हे-नन्हे-से हाथ और पाँव,
और नन्हा, प्यारा-सा, छोटा-सा
उठता और सिमटता सीना।"

'श्वास!'- माँ सोच उठती,
'यही सीने का उठना-सिमटना तो
धड़काए रखता है इस नन्हे से सीने को!

और तभी, तेज़ हवा के चलने से
बाहर हवा में लहराते पेड़ों की
चर्र-मर्र की आवाज।
एक अनकहा धन्यवाद,
और आँसू की एक बूँद!

उस चर्र-मर्र और इस धड़कन में
कितना गहन नाता है-–
एक अदृष्य, अनकहा नाता!

केदारनाथ-

माँ ने बेटे को प्यार से
लोरी गा, सुलाया,
और फिर प्रेम से उसको निहारती रही-
देर तक-
"नन्हा-नन्हा-सा चेहरा,
नन्हे-नन्हे-से हाथ और पाँव,
और नन्हा, प्यारा-सा, छोटा-सा.....
छोटा-सा...
… श्वास...?!"
माँ चीख उठती!
बदहवास टटोलती उसकी धड़कन...
और तभी प्रचंड जल के वेग से हाहाकार
और इमारतों के गिरने की आवाज़...
एक चीखता-सा सत्य...
और आँसुओं की लड़ी...!

इस हाहाकार और इस स्पंदनहीनता में
कितना गहन नाता है-
एक अदृष्य, अनकहा नाता.....!!

यहाँ-

माँ ने खिड़की से बाहर झाँक कर
उन वृक्षों को अपनी आँखो से छुआ,
"तुम्हारे वन परिवारों को
यदि हिमालय में नहीं काटा होता,
तो केदारनाथ का जल-प्रलय
भला क्यूँ होता?!"

०६१३२३/०६१३२३