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तस्वीर से परे - अनहद की कलम से

तस्वीर से परे

ये ना जाने क्यूँ मुझे,
लग रहा यूँ देख के,
आपका ये चित्र मेरे सामने।
लाड़ से यूँ देखते,
प्यार से यूँ देखते,
मुस्कुरा के भर रहे हो भाव से।

जैसे कह रहे हो यूँ,
मैं तुम्हारे साथ हूँ,
तुम कहीं भी, और कुछ भी कर रहे।
मुक्त हो के जी रहो,
उन्मुक्त हो के जी रहो,
व्यर्थ ही क्यों बंधनों में बँध रहे।

खुल के आसमान में,
उड़ रहो यूँ शान से,
जैसे तुम हवा की गोद हो चले।
बादलों की टोलियाँ,
पक्षियों की बोलियाँ,
सुनते, इनके संग-साथ खो चले।

तुमको है दुआ मेरी,
सुन रहा सदा तेरी,
माँगते हो उसको-- वो भी जानता।
तुम मुझे पसंद हो,
तुम उसे पसंद हो,
रूप छोड़-- आत्मा से वास्ता।

हो रहो विनम्र तुम,
सुन रहा तुम्हारी धुन,
तुम में कितना धैर्य, आस्था रही।
मैं तुम्हारे साथ हूँ,
अपनी शक्ति-- हाथ दूँ,
थाम लो इसे तुम्हें उठा रही।

जो कभी कठिन लगे,
रास्ता जटिल लगे,
आँख, चित्र में ये मेरी देखना।
प्यार इनमे है भरा,
आँख मूँद कर ज़रा,
इनको अपने भाव में समेटना।

प्यार तुम पे ये मेरा,
भाव से जो बह रहा,
फूल हो के खिल रहेगा राह में।
तुम हमारे अंश हो,
इसलिए निशंक हो,
प्यारे श्री नवल, अरुण, सुहास रे!

२५०८०३/२५०८०३