कुछ लोग हमारे जीवन में
इतने करीब क्यूँ हो जाते,
कुछ दिनों भी उनसे दूर रहें,
हम बेबस दिल यूँ हो जाते।
जब तलक साथ उनके रहते
ये खबर नहीं होने पाती,
कि साथ कभी जो छूट रहा,
तो छा जाएगी बेज़ारी।
उनकी दिलकश वो आवाज़ें,
उनके होठों की मुस्काने,
उनकी हर बात पे वो नखरे,
उनकी हर अदा के अफ़साने।
वो घड़ी रोज़ की बातों की,
वो प्यार, बहस, मनुहारों की,
वो घर, कुटुंब, व्यवहारों की,
और तंगदिल, दिलदारों की।
लफ्ज़ो के बिखरे वो मोती,
कुछ तारीफ़े, कुछ सरगोशी,
कुछ यूँ ही मौसम, तबियत की,
कुछ बातें, बातें करने की।
वो कृष्ण, बुद्ध की स्तुतियाँ,
वो ध्यान-साधना अनुभव की,
वो पूनम और अमावस पर,
कुदरत के बिखरे वैभव की।
वो सुना जहां के अफसाने,
फिर कहना 'हमको करना क्या?'
'वो तो तुमने जो पूछ लिया,
सब कहा, कहेंगे वर्ना क्या?!'
वो हंस जाना, वो रो जाना,
राजी या कभी बिफ़र जाना,
कभी चुप रह कर, सब कह जाना,
कभी कह कर सब, चुप हो जाना।
वो दरिया दिल, वो शेरे-दिल,
वो साथ निभाती हर मुश्किल,
हर हाल हौसला अफज़ाई,
वो हिम्मतवर, बेखौफ, निडर।
वो प्यार हमें इतना देना,
भर जाना दिल के प्यालों का,
जो दूर हुए दिल से दो पल,
प्यालों का छलक, बिखर जाना।
ना जाने कितनी याद भरीं,
यादों में बहकर आँख भरीं,
आँखों से आँसू ढ़ुलक रहे,
फिर मिल पाने की आस भरी।
जब तलक वो नहीं आ जाते,
हर हाल बेरुखी, बेज़ारी,
हर रस्म बेमज़ा, बेरौनक,
दुनिया की हर शै बेमानी।
कुछ लोग हमारे जीवन से
इस तरह विदा क्यूँ हो जाते,
हतप्रभ कुदरत के खेलों पर,
हम तड़प-तड़प रोते जाते।
२५०८२१/२५०८२९





