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एक अजन्मे को पत्र
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गुरु-सानिध्य - अनहद की कलम से

गुरु-सानिध्य

रास्ता ही लक्ष्य है,
और लक्ष्य ही है रास्ता।
साथ गुरु हो तो समय,
दूरी से किसका वास्ता।
रास्ता ही लक्ष्य है
और लक्ष्य ही है रास्ता।

कितनी चट्टानों से गुज़रे,
कितनी घाटी खो गईं;
कितनी करवट राह बदले,
ऋतुएँ जागीं, सो गईं।
चल रहा होता अकेला,
हर डगर मैं नापता।
साथ गुरु हो तो समय,
दूरी से किसका वास्ता।
रास्ता ही लक्ष्य है,
और लक्ष्य ही है रास्ता।

कितनी बातें साथ करते,
ईश की-- भगवान की,
देह की, मन की, विचारों से
विरत स्थान की!
साथ संसारी के चलते,
राह का भ्रम भासता।
साथ गुरु हो तो समय,
दूरी से किसका वास्ता!
रास्ता ही लक्ष्य है,
और लक्ष्य ही है रास्ता!

और खामोशी में उनकी,
दिव्यता ही बह रही,
ऊर्जा उस मौन की,
हृदय हमारे भर रही।
शोर भीतर के थमे,
खुल जाए प्रभु का रास्ता।
साथ गुरु हो तो समय,
दूरी से किसका वास्ता!
रास्ता ही लक्ष्य है,
और लक्ष्य ही है रास्ता!

२५०९२९/२५०९२९