दिन उठा और साथ में मुझको उठाया,
मगर मैंने कह दिया- कुछ देर
मैं बिस्तर पे ही लेटा रहूँगा;
रात भर नींदें मुझे आती नहीं हैं,
तुम तो होते ही ज़रा सी रात, सोने
बिस्तरों पर लेट जाते,
और काली झिलमिलाती चादरें
तुम ओढ़ कर सिर तक-
नींद में डूब जाते।
फिर कोई कितना भी चीखे,
रात भर तुमको हिलाए,
पर तुम्हारी नींद गहरी इस कदर है,
चीख-चिल्लाने, हिलाने का तुम्हें
कोई पता लगता नहीं।
और कोई रात या दो रात का भर
सिलसिला ये है नहीं।
ये तो सदियों से तुम्हारी गहनतम
आदत में शामिल हो चुका है।
और जैसे ही अरुण जो
सूर्य का रथ ले तुम्हें आता उठाने,
झट से काली झिलमिलाती चादरें
खुद से हटा तुम फेंक देते!
इतनी गहरी रात भर की नींद से
तुम जब हो उठते ,
किस वज़ह तुमको थकाने आ सकेंगी!
क्यों पड़े रह जाओगे अलसाए-से
मेरी तरह अपने बिछौने!
कैसे आ जाती है तुमको
नींद गहरी इस कदर!
सूर्य तो तुमको कभी भी बैठने का
वक़्त भी देता नहीं है।
और मैं ये देखता हूँ,
उम्र मेरी हो गई जितने बरस की-
कितनी मेहनत इस जमीं को
तुम बचाने, तुम बढ़ाने कर रहे हो!
कितनी इसके जीव और निर्जीव
का तुम ख्याल रखते।
उनकी चोटों पर कभी मरहम लगाते,
उनके रोने से निकलते
आँसुओं को पोंछते तुम।
रोशनी में जो भी दुख तुम देख पाते,
उन सभी को तुम
नियम से बद्ध रह कर भी,
बिना शिकवा-शिकायत
और ना अहसानों को अपने
तुम जताकर-
किस तरह करुणा
और कितने प्यार से तुम,
हर समस्या का सही उपचार लाते।
हम मगर अपने ज़रा से काम से ही,
इन थकानों से भरे यूँ घूमते हैं!
थोड़े ही दुख के विषय और
ज़ख्म सीने से लगा
हम रात भर ले ले के करवट सोचते हैं!
और जब फिर तुम सुबह आकर
हमारी नींद से हमको जगाते-
चादरों को और ऊपर खींच कर
सिर तक चढ़ाकर और थोड़ी देर
यूँ ही ऊँघते हैं!
उम्मीद करते हर सुबह कि
आज तो कुछ देर यूँ ही लेट कर हम,
फिर सुबह ताज़े उठेंगे!
जिस तरह तुम,
उठ के जीवन को खिलाते,
जिस तरह तुम फूल में मुस्कान,
चिड़ियों में नए सुरताल भरते,
हम भी शायद आज उठ के,
अपने जीवन में
नई किलकारियाँ भर पाएंगे,
और भी जो राह मे हैं साथ चलते,
आज उनके रास्तों में,
फूल की खुशबू को हम फैलाएंगे।
किंतु यूँ कुछ देर ऐसे ऊँघ जाना,
ना हमे भरता किसी नव-ताज़गी से,
ना ही किलकारी कोई जीवन मे आती,
ना ही खुशबू रास्तों में भी
किसी के फैल पाती!
पूछता हूँ, तुम ये इतना श्रम जो करते,
इतनी दुश्वारी, दुखों को रोज़ सहते,
कैसे फिर भी अनथके
सदियों से चलते,
किस तरह फिर रात भर
बस एक करवट ही लिए,
बिस्तर पे रहते!
दिन ने मुझको प्यार से यूँ देख कर,
होंठ को अपने ज़रा यूँ खोल कर,
वो कहा जो राज़ हम सब ढूँढते हैं,
किंतु अपनी दौड़ में सब भूलते हैं-
“तुमने पूछा, ‘श्रम निरंतर करके भी
थकता नहीं- क्या राज़ इसका,
क्यूँ दुखों, पीड़ाओं को मैं
देख कर विचलित नहीं होता कभी?
मित्र मेरे, मैं तो बस इस सत्य की
बाहें पकड़ कर जी रहा हूँ,
सूर्य पर करके समर्पण-पूर्ण मैं,
बस चाल उसकी और गति
उसकी समझ कर जी रहा हूँ।
देखता हूँ बस, नहीं करता कभी कुछ,
ऊर्जा सूरज कि मुझमे खुद-ब-खुद
रहती सदा है,
मुझको कुछ करने की फिर कोई भी
ज़रूरत ही कहाँ है?
"इतनी तो मुझको समझ इक उम्र में
आ ही गई थी,
रात भर मेरे बिना कुदरत नहीं
मुरझा गई थी।
कुछ दिनों इसको समझने
और गहरे जब गया,
जान पाया सूर्य के ही तेज से
रातें भी जीवन जी रहीं।
चाँद में जो रोशनी दिखती है वो भी,
सूर्य की झलकी रही।
फिर मेरी शंका हमेशा के लिए
मुझसे विदा लेती गई,
और उस दिन से ये करने का
न संशय रह गया,
और गहरे सत्य उतरा-
ना तो मेरी ही वज़ह से
फूल ये हैं खिलखिलाते,
ना ही चिड़ियों कि महकती
चहचहाहट,
ना नदी का दौड़ना, बादल घुमड़ना,
और ना ही इन पहाड़ों का उभरना,
ना समुंदर की लहर तट से लिपटना,
और उसकी थाह का हासिल ना होना!
ये सभी तो कृत्य होते हैं
नहीं मैं स्वयं करता।
सृष्टि के अपने नियम हैं,
और ऋतुएँ उन नियम से ही बदलतीं।
तुम भी कर लो ख्याल
ऐसे ही नियम का,
और कर दो तुम समर्पण पूर्ण अपना,
उस नियम पर।
फिर तुम्हें धरती दिखेगी घूमती बस,
फिर तुम्हें सूरज दिखेगा-
रोज़ आते, रोज़ जाते,
पर नहीं कुछ भी दखल
उनका दिखेगा,
फिर तुम्हारे साथ जो भी हो रहा
दिन-रात,
जो तुम सोचते हो
कर रहे इतना परिश्रम,
दुख उदासी से डरे तुम घूमते हो,
वो सभी तत्क्षण ही तुमको
सत्य कि गहरी नज़र से दिख रहेगा।
और फिर ना कार्य कोई,
ना परिश्रम का कोई वर्तुल रहेगा।
ना थकोगे, ना कभी तुम दीन-दुनिया
के दुखों से ही डिगोगे!
ये ही मेरा राज़ है, तुमको सुनाया।
जो सुना उसको समझ कर,
और गहरे में उतर कर;
कर रहो अनुभव ये जो है सत्य मेरा,
और जो ये सत्य है मेरा नहीं है सिर्फ,
ये तो सत्य है, हर इक अणु का!”
सत्य ये मुझको दिखाकर,
दिन तो मुस्काता चला!,
और पश्चिम में सिंदूरी सूर्य को
मैं देखता हूँ डूबते।
रात गहराती औ’ अपनी
चाँदनी चादर उढ़ा, लोरी सुना
दिन को सुलाती!
मैं भी अब नव-दृष्टि लेकर,
खोजने सच को मेरे
भीतर चला हूँ!
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