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"माँ"- मेरी प्रथम गुरु - अनहद की कलम से

“माँ”- मेरी प्रथम गुरु

तिनका–तिनका जोड़ कर अपनी जिंदगी के हर लम्हे से, वो हमारे हिस्से का वक़्त बुनती है!

कभी खामोशी से और कभी तेज़ आवाज़ से; कभी अपनी आंखों के महीन इशारे से या कि अपनी हथेलियों को हमारे गालों पर उभार कर; और कभी बस लाड़, प्यार और दुलार से माँ हमें तैरा देती है इस अस्तित्व में जीने के लिए… अपना गीत गाने के लिए, अपना नृत्य करने के लिए… जीवन के इस महा–उत्सव में आनंदित होने के लिए!

इस अस्तित्व में हम जीते हैं उस माँ के ही प्राणों से; उसके ही विस्तृत आकाश में उड़ते; उसकी प्रेम भरी ऊष्मा और ममता भरी शीतलता में तपते या शांत होते; उसके ही दिए उजियारों की ऊँचाईयों और अंधकार की आवश्यक गहराइयों में तैरते–उतरते…! उसकी ही कोमल किंतु दृढ़ उंगली को पकड़ कर चलते और फिर उसी उंगली की रोशन दिशा में बढ़ते एक अनंत सत्य की निर्मल धारा की ओर!

माँ सिर्फ एक लफ्ज़, एक संबंध नहीं, बल्कि है एक समूचा अस्तित्व जिसकी गोद में बैठते या जिसके आकाश में विचरते हम अनुभव करते हैं जीवन का अद्भुत सत्य, सौंदर्य और आनंद!

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