सारी गागर रीत चुकी है,
अब थोड़ा अमृत-जल भर दो।
तुमने मुझको खाली करने ध्यान सिखाया,
ध्यान विधी भी सारी अब तो भूल चुकी हैं;
आत्मद्वार की चाबी पाने दौड़ रहा मैं,
लगता है कि दौड़-दिशा प्रतिकूल हुई है!
अर्ध-रात्रि अब बीत चुकी है,
अब थोड़ा विश्राम भी कर लो,
सारी गागर रीत चुकी है,
अब थोड़ा अमृत-जल भर दो।
साधु-संत की टोली देखो, जम के निकली,
जो भटका वो भूल गया, संतों का नगमा;
मैं भी भटका पर जोगी की माला लेकर,
पर जोगी की ये माला भी टूट चुकी है।
वन की राहें छूट चुकी हैं,
अब थोड़ा जनपथ पर चल दो,
सारी गागर रीत चुकी है,
अब थोड़ा अमृतजल भर दो।
बाज़ारों की चमक-दमक, और शान तो देखो,
बिकने की सारी चीज़े भी इठलाती हैं;
जो अनमोल रहा, वो सबसे छिपा हुआ था,
पर आँखें जौहरी की उस पर टिकी हुई हैं।
चकाचौंध अब छूट चुकी है,
अब थोड़ा वंदन भी कर दो,
सारी गागर रीत चुकी है,
अब थोड़ा अमृतजल भर दो।
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