सीपियों ने बिताई है तमाम उम्र
शंख के साथ,
शंख की ध्वनि का उन्हे,
अनुमान पर नहीं।
लहरों ने कब छोड़ा है
समंदर का साथ?
उसकी गहराई का उन्हें,
अंदाज़ पर नहीं।
आईनों ने उकेरा है
चेहरों को बार-हो-बार,
उनकी तपिश का उन्हे,
आभास पर नहीं।
गुलों ने देखा है
भँवरों को खुद पर मंडराते मगर,
उनके भावों का उन्हें,
अहसास पर नहीं।
०९०६०१/०९०६०१





