इस तरफ़, इस तरफ़
औ' इस तरफ़ मैं बढ़ रहा...
मैं बढ़ते-बढ़ते रुक रहा,
मैं रुकते-रुकते चल रहा,
कि आँख की किनार से,
अदृश्य को मैं तक रहा।
कोई पुकारता मुझे, सुदूर से,
"सराय है,
"कुछ पहर, या कुछ दिवस
-ना मान तू बसा यहाँ।"
मैं शांत-शून्य बैठता।
कभी टहल, कभी चहल,
कभी बड़ा मचल-मचल,
“क्या सच पुकारता कोई,
या भ्रम का भास भासता?!”
आस बाँधती रही- मेरी पुकार ईश की-
कि मैं पुकारता उसे औ'
वो पुकार सुन रहा!
मैं शुष्क-कंठ पूछता,
"मापता मुझे कि मेरे,
पग की छाप ले रहा,'
सबर सिखा रहा-लगे,
औ’ रास्ता भी बुन रहा!
इस तरफ़, इस तरफ़
औ' जिस तरफ़ मैं बढ़ रहा,
मैं धीर-धीर धर रहा,
विश्वास आस भर रहा,
कि आँख की किनार से,
अदृश्य सत ही तक रहा,
अदृश्य सत ही तक रहा... !!
१९०५०४/१९०५०४





