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अकेला - अनहद की कलम से

अकेला

ये कहाँ मालूम था मुझको
कि इतना, मैं अकेला आज
खुद से भी विलग रह कर जिऊँगा!
वृहद दुनिया की असीमित भीड़ में भी,
एक भी ना कोई जिससे
इस हृदय को कह सकूँगा!
ये तो सोचा ही नहीं था!

कोई बैठा सामने हो, सोचता तब,
“छोड़ मुझको ये अकेला क्यों न जाता,
बैठ कर एकांत में तब,
मुखर हो अपने हृदय से, आप-स्व से,
बात तब मैं कर सकूँगा!”

मैं अकेला बैठता जब
स्वयं से एकांत में कुछ बात करने,
हृदय की जिंह्वा कदाचित्
तालु पर ही ठहर जाती!
“मित्र कोई सामने आए”
-मैं ये ही सोचता, तब
बात अपने हृदय की मैं
होंठ से तो कह सकूँगा।

बात पर हिय की हृदय में ही
न मुख से बोल उठते,
व्यग्रता बस एक दिल से
होंठ तक खिंचती...
भला कब तक मैं ऐसे जी सकूँगा?

९३०५१०/९३०५१०