वो साँसें आ रही भीतर,
वो साँसें जा रही बाहर;
कभी रुक जाए कहीं इक छोर,
सोच मैं सहम जाता हूं।
परिंदों की खुशी से कूकती
आवाज़ आती है;
तेरा सजदा, अरे मौला,
कभी क्यों भूल जाता हूं?!
वो चलता हूं जो पैरों पर
खड़े होकर बेफिक्री से;
इबादत रूह से निकले,
सदके कुर्बान जाता हूं।
करिश्मा है ये कुदरत का,
ज़ायके अलहदा कितने;
कभी खट्टे, कभी मीठे,
लुत्फ ले ले के खाता हूं।
कभी फूलों की खुशबू से,
कभी साहिल के दामन पे;
हवाओं के हसीं झोंके,
खुदी को भूल जाता हूं।
वो दिखता है फलक पे नूर--
चांद, सूरज और तारों का;
बीज का पेड़ हो जाना,
खुशी से झूम जाता हूं।
पियाले मय के पीता हूं,
वो सब कुछ भूल जाने को;
मगर हर घूंट तुझको याद मैं
करता ही जाता हूं।
कभी महफिल नयी सजती,
कभी बज़्मे इनायत हो;
मेरी तो हर नयी मजलिस,
मैं तुझको ही बिठाता हूं।
निकल कर लंबे रस्तों से,
नदी सागर को बढ़ती है;
खुदाया तू मेरा साहिल,
तुझे पहचान जाता हूं।
ऐ मेरी ज़िंदगी तूने,
हसीं तोहफे दिए इतने;
खास ये शुक्र है हर इक,
सुबा मैं जाग जाता हूं!
२५०४०८/२५०४१३





