suhas_giten
WhatsApp Image 2025-07-08 at 21.29.45
एक अजन्मे को पत्र
IMG-20250705-WA0011
IMG-20250705-WA0018
IMG-20250705-WA0015
IMG-20250705-WA0013
previous arrowprevious arrow
next arrownext arrow
अल्फ़ाज़-ऐ-शुक्रिया - अनहद की कलम से

अल्फ़ाज़-ऐ-शुक्रिया

वो साँसें आ रही भीतर,
वो साँसें जा रही बाहर;
कभी रुक जाए कहीं इक छोर,
सोच मैं सहम जाता हूं।

परिंदों की खुशी से कूकती
आवाज़ आती है;
तेरा सजदा, अरे मौला,
कभी क्यों भूल जाता हूं?!

वो चलता हूं जो पैरों पर
खड़े होकर बेफिक्री से;
इबादत रूह से निकले,
सदके कुर्बान जाता हूं।

करिश्मा है ये कुदरत का,
ज़ायके अलहदा कितने;
कभी खट्टे, कभी मीठे,
लुत्फ ले ले के खाता हूं।

कभी फूलों की खुशबू से,
कभी साहिल के दामन पे;
हवाओं के हसीं झोंके,
खुदी को भूल जाता हूं।

वो दिखता है फलक पे नूर--
चांद, सूरज और तारों का;
बीज का पेड़ हो जाना,
खुशी से झूम जाता हूं।

पियाले मय के पीता हूं,
वो सब कुछ भूल जाने को;
मगर हर घूंट तुझको याद मैं
करता ही जाता हूं।

कभी महफिल नयी सजती,
कभी बज़्मे इनायत हो;
मेरी तो हर नयी मजलिस,
मैं तुझको ही बिठाता हूं।

निकल कर लंबे रस्तों से,
नदी सागर को बढ़ती है;
खुदाया तू मेरा साहिल,
तुझे पहचान जाता हूं।

ऐ मेरी ज़िंदगी तूने,
हसीं तोहफे दिए इतने;
खास ये शुक्र है हर इक,
सुबा मैं जाग जाता हूं!

२५०४०८/२५०४१३